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कवि गोष्ठी का आयोजन किया गया।

आज़मगढ़।

सरायमीर।  अख्तर मुस्लिमी माइनॉरिटी एजुकेशनल सोशल एंड वेलफेयर ट्रस्ट (रजिस्टर्ड) के तत्वाधान में प्रख्यात उर्दू कवि अख़्तर मुस्लिमी की याद में दानिश फराही के आवास पर कवि गोष्ठी का आयोजन  किया गया।
डॉक्टर शफ़ीक़ आज़मी ने कहा कि अख़्तर मुस्लिमी अख़्तर मुस्लिमी का लिखा हुआ मदरसतुल इस्लाह का तराना बहुत शानदार है इतना शानदार की अगर वह कुछ और न लिखते मात्र तराना ही लिख देते तो उनकी ख्याति के लिए पर्याप्त था। अख़्तर मुस्लिमी की शायरी पर बोलते हुए डॉक्टर फ़ैयाज़ अलीग ने कहा कि अख़्तर मुस्लिमी दर्द को दवा करने का हुनर जानते थे।  उन्होंने गुलाम हिंदुस्तान में आँखें खोलीं और आज़ाद हिंदुस्तान में वफात पाई, उन्होंने आज़ादी और गुलामी दोनों को बहुत करीब से देखा और भुगता था, जंगे आज़ादी से लेकर जम्हूरियत तक कि स्तिथि को बहुत ही क़रीब से देखने वाले अख़्तर मुस्लिमी को ग़ुलामी और आज़ादी की स्तिथि में कोई बहुत अंतर महसूस नहीं होता, ये सब बातें उनकी शायरी में जगह जगह आयी हैं।
कार्यक्रम का शुभारंभ मुफ़्ती खुर्शीद ने अख़्तर मुस्लिमी की लिखी नाते पाक पढ़ कर किया।
इसके बाद शायरी का दौर चला। दानिश फराही ने 'ईमाँ की हरारत कभी कम होने न देंगे, पेशानी बुतों के लिए ख़म होने न देंगे' सुनाया तो पूरा हॉल तालियों से गूँज उठा।डाक्टर फ़ैयाज़ अलीग ने 'अपने ऊपर गर भरोसा है तुम्हें फ़ैयाज़ तो, मौजे दरिया कुछ नहीं है शोरे तूफाँ कुछ नहीं' सुनाया।डॉक्टर रंजन आज़र ने 'तू है राजा रंक हूँ मैं फ़र्क़ है इतना फ़क़त, साथ तेरे माँ का आँचल और मैं तन्हा बहुत' सुनाया तो गोष्ठी तालियों से गूँज उठी।नियाज़ अशहर की ग़ज़ल 'यहाँ अजीब सा मन्ज़र दिखाई देता है, हर आस्तीन में खंज़र दिखाई देता है' को खूब सराहा गया।मुफ़्ती खुर्शीद ने 'टूटे हुए ख़्वाबों की चुभन कम नहीं होती, अब रो के भी आँखों की जलन कम नहीं होती, को ख़ूब वाह वाह मिली।आफताब मुजाहिद ने 'क़त्ल इंसाफ का होता है सरे आम यहाँ, परवरिश जुर्म की सरकार के घर होती है' सुनाया।साजिद बदर ने 'तू जो फौलाद है शीश तो नहीं हूँ मैं भी, सर झुका दूँ यूँ ही ऐसा तो नहीं हूँ मैं भी' सुनाया।डॉक्टर शफ़ीक़ ने 'हमारे हौसलों पर है हवा का रुख़ बदल जाना, बहुत मुश्किल है वरना वक़्त के तूफाँ का टल जाना' को ख़ूब वाह वाह मिली।याक़ूब आज़म ने 'ख़ून नाहक़ पर कोई आवाज़ उठती क्यों नहीं, क्या रिआयत कर रहे हैं क़ातिलों के साथ हम' सुनाया।गोष्ठी की अध्यक्षता डॉक्टर शफ़ीक़ आज़मी और संचालन डॉक्टर आफताब मुजाहिद ने किया। डॉक्टर फ़ैयाज़ अलीग मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे।
अहमद वासे,अबूज़र, फजलुर्रहमान, हेलाल इस्लाही, साजिद, सहरिश नदीम ख़ान, अमीन, अबुलकलाम, नदीम फराही, आदि गणमान्य लोग मौजूद रहे।
अन्त में नदीम फराही ने मेहमानों का शुक्रिया अदा किया।

मोहम्मद यासिर सरायमीर 

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