आज़मगढ़।
रिपोर्ट: वीर सिंह
कवरेज डेस्क: जनपद आजमगढ़ के जाने-माने साहित्यकार और प्रगतिशील लेखक संघ,उ.प्र. की राज्य कार्यकारिणी में उपाध्यक्ष मण्डल के सदस्य एवं प्रलेस- आजमगढ़ इकाई के अध्यक्ष लालसा लाल तरंग जी अब नहीं रहे।विगत दो अप्रैल को वो दिल्ली से आजमगढ़ आये थे।दो दिन पूर्व कोरोना-संक्रमण के कारण आजमगढ़ के पीजीआई, चक्रपानपुर में उन्हें भर्ती कराया गया था।कल दोपहर ढाई बजे के करीब उनका निधन हो गया। उनके निधन से आहत डॉ0 संजय श्रीवास्तव महासचिव प्रलेश उ0प्रदेश ने अपनी संवेदना में लिखा है कि -तरंग जी का प्रगतिशील आंदोलन के लिए विशेष योगदान रहा। आज आजमगढ़ का साहित्य-समाज उनके बिना सूना हो गया है। ऊपर से कठोर किंतु अंदर से उतने ही कोमल स्वभाव के तरंग जी लगभग तिरासी साल की उम्र में भी बेहद सक्रिय और ऊर्जावान व्यक्ति रहे। वे अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता और संघर्षशील व्यक्तित्व के लिए जाने जाते रहे। लंबे समय तक बिहार में सेवारत रहते हुए कर्मचारी संगठन और प्रलेस की सक्रियता के लिए उन्हें जाना गया। बेगूसराय और समस्तीपुर प्रलेस में अठारह साल तक अपना योगदान देने के बाद 2006 से अभी तक वे आजमगढ़ में प्रगतिशील लेखक संघ के अध्यक्ष थे। बाबा नागार्जुन का विशेष सान्निध्य उन्हें मिला था। कविता और आलोचना के क्षेत्र में उनकी समान गति थी। प्रकृतित: गीतकार तरंग जी अपनी रचना-संस्कृति में भी प्रतिबद्ध व सजग दिखाई देते हैं। वे बदलाव के लिए लिखते और जीते थे।
डॉ0 गीता सिंह सम्पादक 'अखिल गीत शोध दृष्टि 'ने बताया कि उनकी अनेक पुस्तकें प्रकाशित हैं जो उनकी याद दिलाती रहेंगी : कई अदद उठे हाथ, सुबह का पैगाम, उखड़ा हुआ शहर(कहानी संग्रह), गुम हवा कुछ कहेगी, हथेली पर अंगारे(गीत-नवगीत संग्रह), कल की सुबह अपनी(ग़ज़ल संग्रह)प्रगीतात्मकता और मानवीय सरोकार, विचार विमर्श।सम्प्रति मुक्तिबोध और धूमिल पर उनकी पुस्तक तैयार है जिसे वे प्रकाशित करने के लिए प्रयासरत थे। उन्होंने अनेक पत्र-पत्रिकाओं के संपादन का भी दायित्व निर्वहन किया।
वरिष्ठ साहित्यकार और सबके दावेदार के सम्पादक श्री पंकज गौतम जी ने अपनी संवेदना में कहा कि-मेरा और तरंग जी का साहित्यिक, पारिवारिक सम्बन्ध लगभग 36 वर्ष का रहा है।तरंग जी सबके दावेदार के सम्पादक द्वितीय लम्बे अरसे से रहें,कल रात बात करते हुये वो भावुक हो गये।
कहानीकार,गीतकार,आलोचक,
पर्यावरणविद ,फ़िल्म 'अनकही' और नाटक हँसुली के लेखक डॉ0 अखिलेश चन्द्र ने कहा कि तरंग जी का जाना आजमगढ़ के साहित्य की अपूरणीय क्षति है।जब भी साहित्य पर आजमगढ़ में चर्चा होगी लोग बरबस तरंग जी को याद करेंगे।वो बार -बार कहते थे कि आप लोग चिंता न करें मैं शतायु होकर साहित्य की सेवा करता रहूँगा, पर उनका यूँ चले जाना बहुत खल रहा है।मेरे परिवार के लिये वो अभिभावक के रूप में भी मेरे साथ खड़े रहते थे।मेरे सह-संयोजन और डॉ0 गीता सिंह के संयोजन में एक राष्ट्रीय संगोष्ठी जो केन्द्रीय हिन्दी संस्थान आगरा द्वारा प्रायोजित थी का उन्होंने सरंक्षक के रूप में नेतृत्व किया था।वो लगातार साहित्य में नवांकुर का स्वागत करते रहते थे।यद्यपि साहित्यिक विचारधारा के धरातल पर वैचारिक भिन्नता होने के बाद भी हम दोनों की घनिष्ठता लोगों को अखरती थी पर वो साहित्य के सच्चे अनुरागी थे।बार-बार कहते थे अखिलेश जी,गीता जी काम कर रहें हैं इसलिये मैं इन दोनों का बहुत सम्मान करता हूँ।साहित्य में काम की सराहना करना उन्हें कभी नही भूलता था।मेरे और गीता जी के कोई लेख या कोई विचार जब भी पत्र पत्रिकाओं अथवा अखबार में छपते थे और अगर उन्होंने पढ़ लिया तो बधाई देने वालों में सबसे पहले रहते थे।
डॉ0 रामअवध सिंह यादव सम्पादक शोध माला ने कहा कि उनके असमय चले जाने से मैं दुःखी हूँ।तरंग जी का और मेरा साथ लगभग 20 वर्ष का रहा जो अब स्मृति बन गया है जिसे मैं ताउम्र नहीं भूल पाऊंगा।
श्रद्धेय तरंगजी को हम सबकी तरफ से विनम्र श्रद्धांजलि !!