आज़मगढ़।
रिपोर्ट: वीर सिंह
आजमगढ़ 08 सितम्बर-- जिला कृषि रक्षा अधिकारी डाॅ0 उमेश कुमार गुप्ता द्वारा कृषकों को सचेत करते हुये धान की फसल में लगने वाले झुलसा रोगों की पहचान एवं नियन्त्रण हेतु सुझाव दिया गया है, जिसके अन्तर्गत इस समय धान की फसल में कहीं-कहीं से झुलसा रोग की शिकायत प्राप्त हो रही है या झुलसा रोग लगने की पूरी सम्भावना है ऐसे में किसान भाई यदि उनकी फसल में झुलसा रोग की शिकायत है तो वे झुलसा रोग की पहचान करने के बाद संस्तुत रसायनों का प्रयोग करके अपनी फसल को इस रोग से बचाव कर सकते है।
उन्होने झुलसा रोग की पहचान एवं उपचार की विस्तृत जानकारी देते हुए कहा कि जीवाणु झुलसा रोग में पत्तियां नोंक अथवा किनारे से एक दम सूखने लगती है। सूखे हुये किनारे अनियमित एवं टेढे़-मेढे़ होते है। इसके उपचार के लिये फसल मे रोग के लक्षण दिखाई देने पर नत्रजन की टाॅपड्रेसिंग यदि बाकी हो तो उसे रोक दें, खेतों में पानी भरा हो तो उसे निकाल दें। तथा इस रोग के रसायनिक उपचार के लिये 15 ग्रा0 स्ट्रेप्टासाइक्लीन व काॅपर आॅक्सीक्लोराइड के 500 ग्रा0 मात्रा को 800 ली0 पानी में घोलकर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करें।
शीथ झुलसा रोग में पत्र कंचुल पर अनियमित आकार के धब्बे बनते है जिसका किनारा गहरा भुरा तथा बीच का भाग हल्के रंग का होता है, पत्तियों पर घेरेदार धब्बे बनते है। इसके उपचार के लिये खड़ी फसल में 1.5 किग्रा0 थायोफिनेट मिथाइल या 01 किग्रा0 कार्बेन्डाजिम की मात्रा को 800 ली0 पानी में घोलकर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करें अथवा 500 ग्रा0 कार्बेन्डाजिम + 250 ग्रा0 मेंकोजेब 500 ली0 पानी में मिलाकर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करें।
जीवाणुधारी रोग के कारण पत्तियों पर कत्थई रंग की लम्बी-लम्बी धारियां नसो के बीच में पड़ जाती है। इस रोग के उपचार के लिये 15 ग्रा0 स्ट्रेप्टासाइक्लीन व काॅपर आॅक्सीक्लोराइड के 500 ग्रा0 मात्रा को 800 ली0 पानी में घोलकर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करें।