लेख।
लेखक: गौरव सिंह राठौर
लेख: हमारी जो प्राचीन संस्कृति भारतीय संस्कृति है वह धीरे-धीरे विलुप्त की ओर तेजी से बढ़ रही है । पश्चिमी सभ्यता पश्चिमी संस्कृति धीरे-धीरे उसकी जगह है अपने पैर पसार रही है सभी परिवार टूटते जा रहे हैं एकल परिवार की प्राथमिकता बढ़ती जा रही है।हमारे पहनावे में हमारे रहन-सहन में हमारे सामाजिक रीति रिवाजों में कई ऐसी चीजे है जो पश्चिमी संस्कृति की ओर बढ़ रही है इसका विकृत रूप वृद्धाश्रम में देखा जा सकता है ।आज के समय मे जो अपने आप को उच्च और सुंदर परिवार कहते कहते हैं उनके वृद्ध माता-पिता वृद्धाश्रमों में अपनी वृद्धाअवस्ता बिताने को मजबूर है जो इस बात का जीता जागता प्रमाण है कि भारतीय संस्कृति की जो प्राचीन परंपरा है वह धीरे-धीरे पलायन होती जा रही क्योंकि माता-पिता का बड़ों का आदर करना माता पिता की सेवा करना उनका सम्मान करना हमारे भारतीय संस्कृति प्राचीन संस्कृति में कूट-कूट के भरा हुआ है और मर्यादा पुरुषोत्तम राम किस के सबसे बड़े उदाहरण हैं
भारत देश की प्राचीन संस्कृति इस बात को पुष्ट करती है कि यहाँ के महान शासकों ने सदा सर्वधर्मसमभाव की नीति अपनाई । यहाँ की लोकतन्त्रीय व्यवस्था में हर धर्म व सम्प्रदाय को समान आदर दिया गया। यहाँ के महान शासकों ने सदैव इसी नीति का अनुसरण किया। हमारा भारत देश ‘विविधता में एकता’ वाला देश है । यहाँ पर विभिन्न धर्मो व सम्प्रदायों के लोग रहते हैं । सभी की अपनी-अपनी भाषाएं, रहन-सहन, वेशभूषा, रीति-रियाज, वेद-पुराण एवं साहित्य है । सब की अपनी-अपनी संस्कृति है । सभी लोगों की संस्कृति उनकी पहचान बनाये हुये है । संस्कृति के प्रकाश र्मे ही भारत अपने वैयक्तिक और बैश्विक जीवन मूल्यों की रक्षा कर सकता है ।यह भारत की एक आदर्श परम्परा थी जिसका पालन राजतन्त्र ने भी किया और लोकतन्त्र ने भी । आज पूरा देश जिस सांस्कृतिक दौर से गुजर रहा है उसके पदचाप में संस्कृति की कोई अनुगूंज नहीं सुनाई देती है । एक तरफ सरकार कहती है कि उसे सांस्कृतिक मूल्यों का भान है और उसके क्षरण को रोकने के लिए कार्यबद्ध है ।किन्तु दिन-प्रतिदिन सांस्कृतिक मूल्य एवं आदर्श नष्ट होते जा रहे हैं । देश भर में संस्कृति के नाम पर अनगिनत संस्थाएं बनी, किन्तु संस्कृति उनसे दूर-दूर ही बनी रही । संस्कृति कोई देवता नहीं जो मंदिरों में ही रहेगी । वह तो एक एहसास है हमारे वजूद का ।संस्कृति एक ऐसा विस्तृत फलक है, जिसमें आदमी और भगवान दोनों शरण पाते हैं । अब इतनी व्यापक अनुभूति को किसी चारदीवारी में कैद तों नहीं किया जा सकता । दर असल जो होना चाहिए था वह न होकर उसके उल्टा हुआ । आज हमारी संस्कृति का सात्विक प्राचीन रूप नष्ट होता जा रहा है ।सांस्कृतिक स्तर पर हमारी स्थिति धोबी के कुत्ते से भिन्न नहीं, न घर के रह गए हैं और न घाट के । न प्राचीन संस्कृति बची है न आधुनिकता पूरी तरह आई है । आज हम न पूरब के हैं न पश्चिम के । एक अजीबो-गरीब संस्कृति के मोहपाश में कैद होते जा रहे हैं । गर्व से कहो हम भारतीय हैं, दोहराने में भी झिझक होने लगी है ।यद्यपि भारतीय संस्कृति का प्राचीन स्वरूप ‘विविधता में एकता’ सुरक्षित है तथापि एकता के आधारभूत रंग धूमिल पड़ गए हैं और विविधता के सतही रंग उभर कर हमारे समक्ष आ गए हैं । हम भारतवासी अपनी भाषा, रहन-सहन, खान-पान और वेशभूषा में भले ही अलग-अलग हों परन्तु हमारी संस्कृति एक ही है जिसे हमे समझना होगा।