फैजाबाद।
यह सच है की जिस तरह सदियों से कुरआन की तिलावत होती हुई चली आ रही है ठीक उसी तरह जब इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम कर्बला के मैदान में शहीद हुये तभी से उनके चाहने वाले उनके गम को मनाते चले आ रहे हैं।इमाम हुसैन को शहीद हुये 1400 वर्ष हो चुके है।मगर उनके ग़म को आज भी मनाया जाता है किताबों को देखिये तारीखों को देखिये बड़े से बड़े बादशाह रहे हो बड़े से बड़े नवाब रहे हो उनके मरने के बाद दुनियां उन्हें भुला बैठी ये कौन सी शख्सियत है ये कौन सी हस्ती है जिसे दुनियां आज तक ना भुला सकी ये इमाम हुसैन की शख्सियत है जिसने इस्लाम को बचाने के लिये अपने परिवार की कुर्बानी दी है और इस्लाम को बचाया है।रसूल स.अ. ने अपने नवासे हुसैन से वख़्ते रुख्सत ये कहा था के हुसैन तुम मेरे दीन को बचाओगे।
तो इमाम हुसैन ने अपने नाना से कहा नाना मैं आपके दीन को बचाऊँगा। नाना आपके दीन को बचाने के लिये अगर हुसैन को अपने 18 साल के जवान बेटे को कुर्बान करना पड़ेगा तो मैं अपने जवान बेटे को कुर्बान कर दूँगा मगर आपके दीन को मिटने नही दूँगा नाना आपके दीन को बचाने के लिये मैं अपने भाई के दोनों हाथों को दे दूँगा मगर आपके दीन को मिटने नही दूँगा। नाना मैं अपना सर दे दूँगा हद तो यह है की मैं अपने 6 महीने के अली असगर का गला दे दूँगा मगर आपके दीन को मिटने नहीँ दूँगा हुसैन ने अपने परिवार की कुर्बानी दी है इसीलिये आज पूरी दुनिया इमाम हुसैन को मानती है हुसैन इस्लाम के लिये वो काम कर गये है जिसे दुनिया ताक्यामत तक भुला नही सकती इसीलिये हुसैन को आज भी याद किया जाता है मोहर्रम मनाया जाता है
फैजाबाद जिले के मौजा ऊँचेगाँव रुहियाँवा में अहले सुन्नत हज़रात अपने तरीके से मोहर्रम मनाते है मोहर्रम का चाँद निकलते ही घर घर में फातिहा ख्वानी होने लगती है मजलिसे होने लगती है नोहा ख्वानी होने लगती है और बड़े अकीदत और खुलूस के साथ यहाँ के लोग मोहर्रम मनाते है।और मोहर्रम की चाँद निकलते ही चाँद रात 1 मोहर्रम से 20 मोहर्रम तक मजलिस होती रहती है। और 5 मोहर्रम 7 मोहर्रम को जामा मस्जिद बड़े चौक से जुलूस उठता हुआ मखदूम मोहम्मद यहिया शाह बाबा के मजार रौजवा पर ताजिया दफनाया जाता है। और 3 5 7 10 मोहर्रम को शबीले अब्बास नजरें हुसैन पिलाई जाती है और 7 मोहरम 9 मोहर्रम को आग पर मातम होता है।और 9 10 मोहर्रम को खिचड़ा खिलाया जाता है।और 10 मोहर्रम को ज़ामा मस्जिद बड़े चौक से जुलूस उठता है। और महबूबगंज बाजार चौराहा पे बीरेट,जंजीर का मातम होता है।और कर्बला रसूलपुर जुलूस पहुँचता है।और रोजादारो के लिये रोजा खोलने का इन्तजाम कर्बला में किया जाता है। और यहाँ की सबसे बड़ी खूबी यह है की 72 तीलियों को मिलाकर तुरबते हुसैन बनायी जाती है अगर एक तीली कम हो जाये तो तुरबत नामुक्ममल समझी जाती है। और एक तीली ज्यादा भी नही लगाई जा सकती यानी तुरबत 72 तीलियों से मुकम्मल हो जाती है ।
इस गाँव में बहुत से शायर भी गुजरे है इन लोगो के शेर इस तरह के हुआ करते थे।
*(सैय्यद लियाकत हुसैन मरहूम साहब)*
*जब तक जमी पर फल्के पीर रहेगा।।*
*घर-घर में यूँ ही मातमे शब्बीर रहेगा।।*
*(शमीम अहमद शमीम मरहूम साहब फैजाबादी)*
*कर्बला तक दीने फितरत मुस्तफा के नाम है।*
*कर्बला के बाद अब शब्बीर का इस्लाम।।*
*(सैय्यद आबिद हसन)*
*अली के बुग्ज में दिन और दुनिया दोनों बर्बाद हो जायेगी*
*लाख पढ़ ले वो कुरआन चेहरे पे रौनक नही आयेगी*
*अभी भी वक्त है अली-अली करने लगो लोगों वरना हस्र में कोई नेकी नही काम आयेगी*
मोहर्रम की 5 और 7 तारीख को जुलूस बहुत क़दीम है और 10 मोहर्रम को अजा दाराने हुसैन ताजियो को लेकर रसूलपुर कर्बला पर पहुंचते है।और ऊँचेगाँव रुहियावा से कर्बला 3 किलो मीटर दूर है।कर्बला में ऊँचेगाँव, महबूबगंज,बारा, बहुत से गाँवो की ताजिया दफनाया जाता है और उसके बाद शामे गरीबाँ (10 मोहर्रम की रात) को मजलिस होती है। मजलिस सुनने के बाद जब लोग अपने अपने घरों को जाते है तो घर वीरान सुनसान नज़र आता है। कर्बला का जिक्र एक ऐसा जिक्र है जिसको सुन कर लोगो की आँखो में आंसू आ जाते है मगर वो कैसे जालिम लोग थे जिन्होंने इतना जुल्म हुसैन और हुसैन के बच्चों पर किया।
इमाम हुसैन की याद में मोहर्रम मनाने का सिलसिला कयामत तक यूँ ही चलता रहेगा और उनकी याद में लोगों की आँखो से आंसूओ का दरियां हमेशा बहता रहेगा।
मिन्जानिब÷ सैय्यद अमानुल्लाह उर्फ़ कल्लू दादा
अन्जुमन अब्बासिया अहले सुन्नत ऊँचेगाँव रुहियावा महबूबगंज जिला फैजाबाद