आज़मगढ़।
रिपोर्ट: वीर सिंह
आजमगढ़, 23 मार्च 2022 : सरकार के नवजात एवं शिशु श्रवण जांच कार्यक्रम के अन्तर्गत नवजात के सुनने की क्षमता की जांच जन्म लेने वाले दिन से लेकर एक वर्ष तक निःशुल्क की जाती है। अगर बड़ों को भी सुनने में समस्या है तो घबराने के बजाय चिकित्सक से लें सलाह और रहें सतर्क। यह कहना है मंडलीय जिला चिकित्सालय के वरिष्ठ परामर्शदाता नाक, कान एवं गला विशेषज्ञ डॉ निर्मल रंजन सिंह का।
डॉ सिंह ने बताया कि श्रवण दिव्यांगता से पीड़ित बच्चे सुन नहीं पाते, इसलिए भाषाई ज्ञान से वंचित होने के कारण मानसिक रूप से भी पिछड़ जाते हैं। यह बच्चों में एक बड़ी समस्या है। क्योंकि तीन वर्ष की उम्र तक बच्चों में भाषा की समझ 85 फीसदी तक विकसित हो जाती है। यदि इस उम्र तक पहुँचने से पहले ही बच्चों को उचित जांच व उपचार की सुविधा मिल जाए तो उनके लिए सामान्य जीवन जीना संभव हो सकता है।
नवजात शिशुओं की श्रवण जांच – सरकार ने श्रवण दिव्यांगता को गंभीरता से लेते हुये नवजात बच्चों की श्रव्यता की जाँचो को अनिवार्य रूप से लागू किया है। यह जांच अस्पतालों में उपलब्ध है। सरकार ने श्रवण दिव्यांगता के दूरगामी प्रभावों को देखते हुये नवजात एवं श्रवण शिशु जांच कार्यक्रम का एक प्रोटोकाल विकसित किया है, जिसमें नवजात के सुनने की क्षमता की जांच जन्म लेने वाले दिन से लेकर एक वर्ष तक निःशुल्क की जाती है।
छोटे बच्चों के लिए जरूरी जाँचे- इसमें दो प्रमुख जाँच की जाती है, जो बच्चों के एक वर्ष होने तक करा लेनी चाहिये। इन दोनों जाँचो को तब किया जाता है जब बच्चा सो रहा होता है और इन्हें करने में कुछ मिनट का समय लगता है। यह जाँच दर्द रहित होती है।
1- इवाक्ड ओटोएकास्टिक इमीशंस (इओएइ) – इस जाँच में एक प्लग बच्चे के कान में लगाया जाता है और ध्वनि भेजी जाती है। प्लग में लगा माइक्रोफोन ध्वनियों के प्रति सामान्य कान की ओटोअकास्टिक प्रतिक्रियाओं (उत्सर्जन) को रेकार्ड करता है। श्रवण दिव्यांगता होने पर कोई उत्सर्जन नहीं होता है।
2- ब्रेनस्टेम इवोक्ड रेस्पान्स आडिओमेट्री (बेरा)- इस जांच में यह देखा जाता है कि ध्वनियों के प्रति मस्तिष्क क्या गतिविधि दिखाता है।
किस उम्र में कौन सी जांच करायें –
1- जन्म के एक माह के अंदर ओटोएकास्टिक इमीशंस (ओएइ) स्क्रीनिंग करायें।
2- अगर ओटोएकास्टिक इमीशंस (ओएइ) जांच फेल हो जाये तो ब्रेनस्टेम इवोक्ड रेस्पान्स आडिओमेट्री (बेरा) जांच अवश्य करायें।
3- छह माह तक जो बच्चे कम सुनते हैं, उन्हें सुनने कि मशीन लगवा देनी चाहिए।
4- पाँच वर्ष के ऊपर के बच्चों की इंपीड़ेंस आडिओमेट्री जांच अवश्य करायें।
5- जो बच्चे अत्यधिक श्रवण दिव्यांगता का शिकार हैं, उनमें एक वर्ष की उम्र में काक्लीयर इंप्लांट करा देना चाहिए। इससे ऐसे बच्चे भी सामान्य रूप से बोलना और सुनना शुरू कर देते हैं।
जांच करने में न करें देरी – रहें सतर्क
1- जो बच्चे जन्म के समय देर से रोयें।
2- जिन्हें जन्म लेने के बाद पीलिया हो गया हो।
3- जो तीन दिन से ज्यादा आईसीयू में भर्ती हो और उसे आक्सीजन दी गयी हो।
4- जिन नवजात शिशुओं की माँ को गर्भावस्था के दौरान पीलिया या वायरस का संक्रमण हुआ हो।
मंडलीय जिला चिकित्सालय में नाक,कान एवं गला की बीमारी के लिए तीन डाक्टरों की ओपीडी कमरा नंबर 16 में होती है। इस समय प्रत्येक डाक्टर की ओपीडी लगभग 90 से 100 मरीजों की होती है। 300 मरीजों की ओपीडी में 20 से 25 मरीज कम सुनाई देना, बहरेपन तथा कान की अन्य समस्याओं से संबन्धित होते हैं। इस क्रम में जनवरी माह में 3086 मरीज, फरवरी में 4216 मरीज तथा मार्च में अब तक 2782 मरीजों की ओपीडी हुई है।
उपरौड़ा निवासी 29 वर्षीय नम्रता सिंह ने बताया कि एक महीने पहले हमें कान में कम सुनने की समस्या थी। डाक्टर को दिखाकर दवा लिया था, अब मुझे काफी आराम है। बेलौरा निवासी 45 वर्षीय संजू सिंह ने बताया की मुझे कानों में सीटी की आवाज के साथ गिल्टी की समस्या थी। यहाँ दवा लेने के साथ इंजेक्शन भी लगाया गया है, सीटी वाली आवाज अब धीरे-धीरे कम हो रही है।