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अकेलापन समस्या है सामाजिक समाधान नहीं- प्रोफेसर अखिलेश चन्द्र


आज़मगढ़।

लेख: जापान विश्व में सबसे अधिक अकेलेपन से जूझता हुआ देश बन गया है।यूँ तो यह समस्या सिर्फ जापान की नहीं है अपितु यह विश्वव्यापी समस्या है जिससे पूरा विश्व जूझ रहा है।अभी जापान से आयी एक खबर के अनुसार वहाँ एक बेरोजगार युवक शोजी मोरोमोटो काम की तलाश कर रहा था तो वह बड़े काम करने की सोच रहा था जैसे सभी युवा सोचते हैं।उसे छोटी नौकरी तो मिल रही थी लेकिन बड़ी नौकरी नहीं मिल पा रहीं थीं।जब उसे अकेलेपन की स्थानीय समस्या का ज्ञान हुआ तो उसने इसी को अपना स्वरोजगार बनाने की सोचा और उसने अकेलेपन से जूझते लोंगो की सूची बनानी शुरू की।उस सूची से उसने अकेलेपन से जूझते लोंगो से सम्पर्क करके उनके अकेलेपन को साझा करने के लिये समय देने की बात की और उनके साथ व्यतीत किये गये समय की कीमत खुद तय की।अकेलेपन को अपना शौक मनाने वाले अंतर्मुखी लोंगो को यह बात बड़ी अच्छी लगी और वो शोजी मोरोमोटो को उसके द्वारा तय गयी कीमत पर अपने अकेलेपन को दूर कराने के लिये बुलाने लगे।शोजी मोरोमोटो उनके साथ बिताये गये पल से उनका अकेलापन दूर करतें हैं और मुँह मांगी कीमत भी वसूल करतें हैं।मजे की बात यह भी है कि जिस भी व्यक्ति के साथ शोजी मोरोमोटो अकेलापन साझा करतें है वो जिस लक्जरी लाइफ को जीता है जैसे-फाइफ़ स्टार होटल या सेवनस्टार होटल में रहना,खाना,सोना,घूमना फ़िल्म देखना,रिसोर्ट पर जाना,देश या देश के बाहर जाने का खर्च वह व्यक्ति वहन करेगा जिसके साथ शोजी रहता है और साथ मे वह व्यक्ति शोजी की उसके पास बिताये गये समय की कीमत भी अदा करता है।
    आज शोजी मोरोमोटो के पास समय नहीं है कि वो लोंगो का अकेलापन दूर कर पाएं, उसके पास रोज के साथ सप्ताहांत की एडवांस बुकिंग है।लोग उससे समय मांग रहें हैं और तो और समय की कीमत भी दे रहें हैं पर उनके अकेलेपन को साझा करने के लिये शोजी मोरोमोटो के पास समय नहीं है।यहाँ एक बात और गौर करने की है कि शोजी मोरोमोटो किसी के घर काम करने के लिये नहीं जाते हैं आप चाहे उन्हें इसकी कोई कीमत दें पर वो काम के लिये कत्तई तैयार नहीं हैं।जब उन्हें बिना काम के इतनी बड़ी कीमत मिल रहीं है तो वो काम क्यूँ करेंगे?
   जापान के साथ अकेलापन आज भारत की भी समस्या बनकर सामने आ रहा है।आज के बहुत से युवाऔर युवतियां परिवार बसाना नहीं चाहतें।वो वैवाहिक जीवन को एक दूसरे की दैनिक आजादी में खलल मानने लगें हैं।उन्हें वैवाहिक जीवन उनके कैरियर में आगे बढ़ाने में बाधा नजर आने लगी है।जापान में तो बाकायदा सरकार द्वारा अकेलेपन को दूर करने के लिये एक मंत्रालय तक बनाना पड़ा है।ब्रिटेन में एक आंकड़े के अनुसार 2017 में अकेलेपन से जूझते लोंगो की संख्या 90 लाख को पार गयी है।भारत भी इस समस्या से जूझ रहा है।हाँ!यहाँ यह आंकड़े में अभी उपलब्ध नहीं है और तो और इस समस्या से जूझने वाला अतिमहत्त्वाकांक्षी व्यक्ति अंतर्मुखी भी होता है तो वह बताएगा भी नहीं कि अकेलापन उसकी समस्या है वह तो समाज मे सीना ठोककर यह कहता मिल जाएगा कि उसके जैसा कोई सुखी है ही नहीं।जबकि सच्चाई उसके द्वारा दिये गये अभिव्यक्ति के बिलकुल उलट है इसे जितनी जल्दी स्वीकार कर लिया जाय और इस अकेलेपन से बाहर आया जाय उतना ही उचित होगा।
विश्व का सामाजिक ताना-बाना एक दूसरे के सहयोग हेतु ही प्राचीन काल से परिवार पर टिका हुआ है।परिवार एक दूसरे की संरक्षा और सहयोग हेतु निर्मित समाज की वह छोटी इकाई है जिसमें आई हुई किसी भी समस्या का समाधान सभी मिलकर निकालते हैं, एक साथ बैठतें हैं, खाते हैं, हँसते-मुस्कुराते हैं, सुख-दुःख साझा करतें हैं, एक दूसरे के प्रति संवेदनशील रहते हैं,पार्टियां मनाते हैं, पिकनिक पर जाते हैं, पिक्चर देखते हैं, टी वी साथ देखते हैं।किसी की भी समस्या का निदान एक से अधिक व्यक्ति मिल बैठकर निकालते हैं।परिवार के लिये कहा भी जाता है कि जहाँ चार लोग होंगे वहाँ कुछ न कुछ अनबन भी होगी ये सच भी है और होनी भी चाहिये क्योंकि परिवार का  हर व्यक्ति सीख ही रहा होता है कोई भी पूर्ण नहीं है लेकिन इसकी(परिवार) की जगह अकेलापन नहीं ले सकता।परिवार में यूँ तो अवसाद के अवसर कम आतें हैं और यदि किसी परिवार के व्यक्ति के साथ ऐसी स्थिति आती भी है तो उसके आव-भाव,व्यवहार से सभी भांप लेते हैं और उसकी मदद करके अवसाद से बाहर भी कर लेते हैं।
    विश्व में अमेरिका भी इस समस्या से जूझ रहा है।वहाँ 1993 से ही घर वापसी के नारे लगाए जा रहें हैं।परिवार की सबसे बड़ी जरूरत अभी हमने कोरोना विभीषिका के समय महसूस किया।कोरोना काल मे जो परिवार के साथ मे थें वो कम डरे हुये थे जो परिवार के साथ नहीं थे वो हजारों किलोमीटर पैदल चलकर परिवार में पहुँचने के लिये जूझते रहें और जब परिवार में पहुँच गए तो परिवार वालों और उनके जान में जान आयी।
    आज की नई टेक्नोलॉजी जिसमें टी वी सीरियल, फ़िल्म,साहित्य में भी अकेलेपन को बढ़ा-चढ़ा कर दिखाया जा रहा है कि अपने लिये जीना सीखो, बंदिशों में मत रहों, दुनियां के लिये नहीं, परिवार के लिये नहीं, अपने लिये जीना सिखों ने भी एक दिवास्वप्न अपने माध्यम से समाज मे परोसा है।जो सिर्फ और सिर्फ ढकोसला है जिसका वास्तविक जिंदगी से कोई लेना देना नहीं है।
     अकेले रहने का एक कारण आत्मनिर्भर होना भी है जैसे ही हम नौकरी प्राप्त कर आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हो जातें हैं हमें यह लगने लगता है कि अब हमें किसी की जरूरत नहीं है।हम स्वतंत्र हैं और हमें अपने तरीके से जीना चाहिये।अपने तरीके से जीना चाहिये यह स्वतंत्रता वाद है पर जिस आत्मनिर्भरता पर आप इतना इतरा रहें हैं क्या यह आपने सिर्फ अपने ऊपर प्राप्त किया है?उसमें परिवार का कितना बड़ा योगदान है?नाना-नानी,दादा-दादी,माता-पिता, भाई-बहन,भैया-भाभी,बुआ-फूफा,चाचा-चाची,
मौसा-मौसी,भतीजे-भतीजी,मामा-मामी का कितना बड़ा आशीर्वाद और शुभकामनाएं हैं ।इस आत्मनिर्भरता में उनका साथ-साथ ,पल-पल का बीता संघर्ष है तब आप आज आत्मनिर्भर बनें हैं,तो अकेलेपन से रहने का फैसला आप अकेले कैसे ले सकते हैं ?यह भी विचारणीय है।आज आप आत्मनिर्भर परिवार के नाते बनें हैं तो परिवार के प्रति आपका भी कर्तव्य है कि आप उसे अकेला न छोड़े।
    06 सितम्बर 2022 की प्रयागराज उत्तर प्रदेश की  एक घटना के अनुसार अकेलेपन का शिकार एक युवक धीरज मात्र इसलिए हो गया कि उसकी कमाई गयी 70 लाख की दौलत की मालकिन उसकी पत्नी हो जाएगी जब वो शादी कर लेगा और उसने ताउम्र शादी नहीं की।अवसाद ग्रस्त अवस्था में जब उसे टीवी की बीमारी हो गयी तो भी उसने मात्र इसलिए अपना इलाज नहीं करवाया क्योंकि उसके पैसे खर्च हो जाते।यहाँ गौर करने वाली बात यह भी है कि धीरज एक नर्सिंग होम में काम करता था और इलाज के अभाव में उसका देहांत हो गया और मरने के बाद उसके बैंक खाते में 70 लाख नकद जमा हैं।जीवन रहते उसने पैसा बहुत कमाया पर पैसों के मोह में अपना जीवन तो बर्बाद किया ही साथ ही साथ सामाजिक ताना-बाना भी खराब करने की कोशिश भी की।अकेलेपन के शिकार लोग अपना तो नुकसान कर ही रहें हैं और समाज का भी नुकसान किये जा रहें हैं।
    भारतीय संयुक्त परिवार या एकल परिवार के बाद अब  अकेलापन को बढ़ावा देने का विकल्प और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के विभिन्न माध्यमों से बढ़ावा करना और उकसाना बाजारवाद से प्रभावित है क्योंकि परिवार संयुक्त होगा या एकल होगा तो वहाँ एक टीवी, एक गाड़ी, एक एसी,एक कूलर,एक घर से काम चल जाएगा और अगर घर में पांच लोग हैं और उनमें स्वतंत्रता का हवाला दे देकर पाँच जगह कर दिया जाय तो हर वस्तु की जरूरत पाँच की होगी और इससे बाजार गुलजार रहेगा।
   अकेलापन युवा रहते अच्छा लग सकता है या आज की विचारधारा में हम अकेले तो नहीं रह रहे हैं पर अकेलेपन का ढोंग भी कर रहें हैं जैसे चलन भी बढ़ रहा है।हाँ यह भी यथार्थ है कि बहुत से लोग बाजारवाद और स्वतंत्रता वाद में अकेला रहना पसंद भी कर रहें हैं।यह आगे चलकर बड़ा घातक साबित होता है क्योंकि एक लोक साहित्य में कहावत है-"अब पछताए का होत जब चिड़ियां चुग गयी खेत"यहाँ बड़ा समीचीन है।जब आप युवा हैं तो शायद कम समझ मे आये जब आप उम्र ढलान पर होंगे तब जब आपसे कोई बात करने वाला नही होगा,कोई हाल-चाल लेने वाला नहीं होगा,कोई सुख-दुःख साझा करने वाला नही होगा,मिली खुशी को व्यक्त करने उस खुशी में कोई शामिल नही होगा,दुःख के पल की संवेदना व्यक्त करने के लिये किसी का कंधा नहीं होगा,किसी के साथ फ़िल्म देखने जाने के लिये किसी का साथ नही होगा,बड़ी महंगी गाड़ी होने के बाद भी कोई हमसफ़र नहीं होगा,हवाई टिकट होने के बाद भी कोई अपना साथ उड़ने वाला नही होगा,बड़ी मल्टीनेशनल कंपनी की नौकरी के बाद कोई मुस्कान वाला चेहरा अपने पास नहीं होगा जो आप पर गर्व कर सके।
   एक तरफ संयुक्त राष्ट्र संघ परिवार दिवस मनाने की घोषणा कर रही है तो दूसरी तरफ हम अकेलेपन का शिकार हो रहें हैं और अवसादग्रस्त होने की तरफ आमंत्रण खुद ही दे रहें हैं।अकेले सफलता के किसी भी मुकाम पर पहुँचने के बाद भी आप खुश किसी भी कीमत पर रह नहीं सकते क्योंकि खुशियां बांटने से बढ़ती हैं तो आप परिवार की बॉन्डिंग को बनायें रखें।
आत्मनिर्भर बनने के चक्कर मे जब हम किसी की परवाह नहीं करेंगे तो कोई हमारी परवाह क्यों करेगा।अक्सर यह शिकायत आती है कि हमारी कोई परवाह नहीं करता। एक प्रश्न आप अपने से कीजिए कि आपने किन-किन की परवाह की?कौन-कौन से लोग हैं जो आपकी परवाह करतें हैं?क्या आपने कभी उनकी परवाह की?यदि नहीं तो आप अकेलेपन के शिकार परिवार में रहते हुये भी हो रहें हैं।
  अकेलापन सिर्फ अकेले रहने वालों के साथ ही नहीं होता।कभी-कभी हम परिवार के साथ रहकर भी अकेलेपन के शिकार हो जातें हैं जैसे एक ही घर मे रहने वाले बहुत से लोग आपस में बातचीत कई दिनों तक न करें,व्यवहार में अंतर्मुखी व्यक्ति भी परिवार में रहते हुए अकेलेपन का शिकार होता है, एक साथ रहते हुए भी सभी अपने-अपने मोबाइल पर सोशल मीडिया पर व्यस्त हो।याद रखें सोशल मीडिया के मित्र आपकी गतिविधियों से परिचित होते हैं।आपके मन में क्या चल रहा है वह आपकी पोस्ट से जानकारी प्राप्त कर लेते हैं पर वो चाह कर भी आपकी मदद नहीं कर सकते।सोशल मीडिया के मित्र ज्यादा से ज्यादा आपकी आर्थिक मदद कर सकते हैं पर वो भी जो आपको परिवार सहित जानता होगा अन्यथा वो इससे भी दूर रहेगा क्योंकि सोशल मीडिया में लोग फ्रॉड का शिकार हो जाते हैं पर आपका पारिवारिक सम्बधी हर परिस्थिति में आपके साथ रहेगा।
   अकेलेपन में सब होकर भी कुछ नहीं होता और परिवार में कुछ न होकर भी सबकुछ होता है इसलिए अकेलेपन की समस्या का समाधान जितना जल्दी हो सके कीजिए क्योंकि एक दिन शरीर थकेगा और पांव दबाने वाला कोई नहीं होगा,एक दिन बीमार होंगे तो कोई उपचार कराने वाला नहीं होगा, एक दिन बाल सफेद होंगे तो कोई सिर में पीछे डाई लगाने वाला नहीं होगा,डिलीवरी मैन से सामान तो आर्डर कर देंगे आपके घर न रहने पर कोई रिसिब करने वाला नहीं होगा और तो और इन मंहगें आलीशान बेशकीमती सामानों के बीच अगर बीमारी से मृत्यु आ गयी तो कोई भी चार आदमी कंधा देने वाला भी नहीं होगा।इसी अकेलेपन के लिये कहा भी गया है कि-"अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ता"।
   वस्तुतः कह सकतें हैं कि अकेलेपन को दूर करने के लिए परिवार से बेहतर कोई दूसरा विकल्प नहीं है।इस विषय को अपनी दो पंक्तियों से समाप्त करना चाहूंगा-
जन्म दिया हमको परिवार ने,जीना है मुझे परिवार संग।
संघर्ष किया परिवार ने,अपने परिवार को सुख देंगे हम।।

लेखक: प्रोफेसर अखिलेश चन्द्र
श्री गाँधी पी जी कॉलेज, मालटारी,
आजमगढ़

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