उत्तर प्रदेश।
लेख
लेख: जिम्मेदारियों का बोझ सिर पर पड़ा, तो देश के वायुवान को चलाने लगी बेटियां "... कविता तिवारी जी की यह पंक्तियाँ आज देश की बेटियों पर सटीक बैठ रही है! नारी की भूमिका जीवन के हर काल खंड मे अतुलित ही रही हैं! समय और परिस्थितियों के काल- चक्र मे उसकी भूमिका को धूमिल करने का भी प्रयास को दरकिनार नही किया जा सकता हैं! सृष्टि के सृजन से लेकर उसके सफल संचालन हेतु इस धरा पर दो आधारभूत तत्वों का होना नितांत ही आवश्यक है,जो एक दूसरे पर आश्रित तथा पूरक है! एक के दूसरे बिना दोनों का जीवन अधूरा ही प्रतीत होता हैं! नर के अभाव में नारी का जीवन अधूरा है,वहीं दूसरी तरफ नारी के अभाव में नर का अस्तित्व मात्र ही संकट जान पड़ता है! सदियों से मानवीय सभ्यता और संस्कृति के उन्नति विकास के क्रम में दोनों तत्वों का योगदान बढ़- चढ़ कर रहा है, परंतु मानवीय असभ्यता के कारण समय-समय पर समानता के अधिकारों में सैद्धांतिक तथा वैचारिक रूप से विषमता समाज मे सदियों से परिलक्षित होता है, जिससे वर्तमानकाल भी अछूता नही है! कभी नारी को कमजोर, अबला, अभागिन जैसे शब्दों से विभूषित किया गया, जो कही से भी उचित नही था! मातृशक्ति का स्वरूप इस धरा के विभिन्न काल खंडों में समय और परिस्थितियों के अनुसार परिवर्तित होता रहा हैं! एक तरफ प्राचीन काल में भारत की शक्ति स्वरूपा नारियों ने वैदिक संस्कृति में हमारे जीवन परंपरा का सजीव चित्रण किया जिससे नारी को शक्ति स्वरूपा नारायणी, गृह लक्ष्मी, देवी का स्वरूप माना कहा गया हैं!
मनुस्मृति में लिखा गया है कि" यत्र नार्यस्तु पूज्यंते रमंते तत्र देवता" अर्थात जहां स्त्रियों की पूजा होती है, वही देवता निवास करते हैं! जिस समाज में स्त्रियों की पूजा नहीं होती है,वहां पर किए गए समस्त अच्छे कार्य असफल ही होते है! प्राचीन काल में नारी- शक्ति को पुरुषों के समान अधिकार प्राप्त होते थे! पुरुष के समान स्त्री को भी धार्मिक, सामाजिक,स्वतंत्रता के साथ- साथ शिक्षा के समान अवसर प्राप्त होते थे! इस कालखंड में गार्गी,सावित्री सती सुलोचना, जैसी नारियों ने अपने त्याग ,तपस्या व शास्त्रार्थ आदि गुणों से युक्त होकर धर्म के स्थानों में भी अपनी वीरता का बखूबी चरित्र चित्रण किया! कालांतर में धीरे-धीरे समानता का स्वरूप बदलता गया और अंततः उसमें विकृतियां आती गयी! नारी के इस कालखंड के स्वरूप को जयशंकर प्रसाद जी ने अपनी कामायनी में लिखा है"
नारी तुम श्रद्धा हो केवल, विश्वास रजत नभ तल में, पीयूष स्रोत सी बहा करो जीवन के सुंदर समतल में!!मध्यकाल में नारी का स्वरूप एक समान नहीं रहा, निरंतर उसमें बदलाव होता गया! मध्यकाल में मुस्लिम शासकों के आगमन के साथ ही हिंदुओं पर बढ़ते अत्याचार लूट की घटनाएं होती रही जिससे जबरन धर्म परिवर्तन के कारण मुस्लिम शासकों ने स्त्री को भोग विलासिता की वस्तु समझने लगे, जिससे कारण धीरे-धीरे स्त्री की भूमिका भारतीय समाज में सीमित होने लगी! नारी का स्थान समाज में कम होने लगा जिससेनारी घर की चारदीवारी के अंदर कैद सी हो गयी! नारी की गतिविधियां को सीमित रूप देने के कारण उसकी प्रतिभा को कुंठित कर दिया गया! जबरन धर्मांतरण के कारण हिंदू धर्म मे बाल विवाह के साथ सती प्रथा का प्रचलन आरंभ हुआ! उस समय एक तरफ भारत में नारी स्वतंत्रता के जीने आवरण मे लिपटी हुयी प्रतीत थी वही दूसरी अज्ञान के अंधकार में जल रही थी! पश्चिमी देश में स्वतंत्रता के साथ ही चारित्रिक और नैतिक मूल्यों की गिरावट इस की महत्ता को सशंकित कर रही थी!इस तरीके से नारी की धार्मिक, आर्थिक, राजनीतिक, स्वतंत्रता समाप्त होने लगी और इस काल में नारी का जीवन दासता का रूप ले चुका था! उस की दासता जैसी दसा को देखकर मैथिलीशरण गुप्त जी ने लिखा था-
"अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी! आंचल में है दूध,और आंखों में है पानी"
अपने वात्सल्य प्रेम, त्याग, सहानुभूति और दूध से शैशव अवस्था को जीवन देने वाली नारी ने बदले मे सिर्फ आँसू ही पाये हैं! आधुनिक काल में नारी ने स्वतंत्रता के कालखंड मे अपनी विराट वीरता का बखूबी नेतृत्व से अपनी क्षमता को रण- भूमि मे परिमार्जन किया! नारी की स्वतंत्रता, स्वालंबन की आवाज देश के समाज सुधार कवियों ने उठाई तथा उसकी शक्ति का चरित्र- चिंतन अपनी रचनाओ मे करके उनकी प्रतिभा को एक रूप दिया! तत्पश्चात देश में विभिन्न क्षेत्रों में नारी की महत्ता को समझा जाने लगा! आज इस कालखंड में नारी अपनी जिम्मेदारियों का बखूबी निर्वहन करते हुए कला,साहित्य,खेल,सुरक्षा,मे अपने दमखम को बखूबी निभा रही है! दुनिया के हर जगह क्षेत्रों मे अपनी प्रतिभा को निखार कर भारत वर्ष का नाम रोशन कर रही है! परंतु इन सब के अलावा चुनौतियों से नारी- शक्ति आज जूझ भी रही है! आज जरूरत है कि भारतीय समाज में नारी को आर्थिक स्वालंबन के साथ- साथ सुरक्षा के अवसर उपलब्ध कराने की आवश्यकता हैं! स्वतंत्रता के साथ ही समाज में नारी के प्रति समाज मे स्वच्छंदता के भाव को भी उजागर करना होगा ! नारी- समाज आज अत्यंत भयावह के दौर से गुजर रही है! जिस तरीके से नारियों पर अत्याचार, बलात्कार, जबरिया धर्मांतरण की घटनाएं बढ़ती जा रही है यह अत्यंत ही चिंता का विषय है! जिस तरीके से वही दूसरी तरफ समाज में नैतिक तथा चारित्रिक , पाश्चात्य संस्कृति का प्रचलन भारतीय संस्कृति और सभ्यता पर काला धब्बा छोड़ रहा है! नारी की स्वतंत्रता जितना इस कालखंड में हैं,उतना शायद ही किसी काल मे नही जान प्रतीत होता है! आज नारी खेल,कुश्ती,अंतरिक्ष तक मे अपनी भूमिका को बड़ी मजबूती से रखा है! एक तरफ नारी अपनी सफलता के नये आयामो को गढ़ रही है वही दूसरी तरफ चुनौतियों से भी जूझ रही है! आज दहेज प्रथा की समस्या भारत मे अत्यंत दयनीय बनी हुई है, भारत के गाँव मे आज भी बेटिया गर्भ मे ही भ्रूण हत्या का शिकार हो जा रही हैं! दहेज प्रथा के कारण न जाने कितनी नारिया काल के गाल मे समा जा रही हैं! भारतीय समाज मे यह किवदंती आज भी मजबूती से यह कथन कहता हुआ फिर रहा है कि केवल पुत्र ही वंश वृद्धि और मुक्तिदाता का निर्वहन कर सकते है जबकि ऐसा कही से भी उचित नही है!आज नारियों की दशा तथा दिशा को बदलने के लिए नारी- सशक्तिकरण, नारी सुरक्षा, मिशन साहसी, जैसे अभियान सरकारों के द्वारा देश भर मे उनकी सुरक्षा तथा स्वाभिमान को जगाने मे अत्यंत महत्वपूर्ण हैं! सरकारों के साथ -साथ समाज के प्रत्येक जिम्मेदार नागरिक को भी अपनी जिम्मेदारी तय करनी होगी की तभी हम इसकी सफल कल्पना कर सकते हैं!...... यथा
"हमे अपनी मानशिक प्रवृत्तियों मे बदलाव लाना होगा, संस्कार तथा शिक्षा, नैतिक मूल्यों का सृजन करना होगा"
लेखक: कल्याण सिंह "शोध छात्र"