Breaking News

गनतंत्र से संचालित भारतीय गणतंत्र।

उत्तर प्रदेश।

लेख

लेख: एक अजीब सी ऊहापोह की स्थिति में खु़द को जकड़ा महसूस कर रहा हूं। अजब कहानी वाला गज़ब देश है भारत गणराज्य। सत्ता के शिखर पर किरायेदार के रूप में पदास्थापित लोग स्वतः को महाराजाधिराज मान देश के नागरिकों को अपनी रियाया समझने की गुस्ताखी कर रहे हैं। इस यथार्थ उद्घाटन से सम्भव है कुछ लोगों की भावना आहत हो परन्तु क्या धरातल की वास्तविकता भी इस कथन के विरोध में प्रचण्ड रूप धारण करेगी? भावना आहत गैंग की चिन्ता करने की आवश्यकता है भी नही। वह जिसका कत्ल करेंगे यदि उसने अपने बचाव में हाथ ऊपर कर दिए तब भी इनकी भावना आहत हो जायेगी। एक संरक्षित प्रजाति जो है फलतः इस गैंग को विधायिका कार्यपालिका, न्यायपालिका और रेबीज धारी नारदीय मीडिया सर्वत्र बिगुल फूंक कर समर्थन प्राप्त है। 
     हमारे देश की बहुसंख्यक आबादी ने मेहनत करने के कई आयाम स्थापित किए हैं। दशरथ मांझी के उदाहरण ने साबित कर दिया है कि मार्ग अवरोधक के रूप में चट्टान ही नही पहाड़ ही क्यों न खड़ा हो, वह मजदूर के विश्वास के समक्ष खड़े होने की जिद अवश्य करता है परन्तु लम्बे समय तक अकड़े रहने का दुस्साहस दिखा पाने में कामयाब नही हो पाता। 
      लब्बोलुआब देश की बहुसंख्यक आबादी कर्मयोगी है कोई दो राय नही, लेकिन यही लोग दिमाग़ का उपयोग करने से हमेशा कतराते हैं। सत्ता का जनादेश देने वाला यह समाज आकलन भी करने में असमर्थ हैं कि जो व्यक्ति हमारे आदेश से प्रधानमंत्री की कुर्सी पर विराजमान है वह सिर्फ़ और सिर्फ़ हमारा प्रतिनिधि है, अधिनायक नही। जो जब चाहे मुंह उठाए और हमें मुफ़्तखोर कह भौंकने लगे।
       भारत; हमारा प्रिय देश गणतंत्र की मंज़िल तक पहुंचने से पहले कई तूफानों के झन्नाटेदार थपेड़ों को सहता और अपने गालों को सहलाता हुआ इस सोपान पर खड़ा है। अफ़सोस! 1952से अनवरत हो al चुनाव में एक भी चुनाव स्वतन्त्र और निष्पक्ष नही हुआ। फ़ौरी तौर पर प्रक्रिया दोषपूर्ण दिखती नही है। लेकिन धरातल स्वतन्त्र और निष्पक्ष चुनाव की गवाही देने को भी राज़ी नही है। बैलेट पेपर और बॉक्स से हो रहे चुनाव में फटते बैलेट पेपर्स और कुएं में फेंके गए बॉक्स को मूक दर्शक बन भारत का लोकतन्त्र देखने को बाध्य था। बन्दूक के दम पर लूटते बूथ के क्षण भी हमारी लोकशाही बधिर रही। उस दौर की विश्वनीयता यह थी कि मतदाताओं को अपने अधिकारों से वंचित करने वालों का चेहरा दिखता था। ईवीएम ने मतदाताओं को भौचक्का कर रखा है, वह मतदान किसी और के पक्ष में करते हैं लेकिन जब वोटों की गिनती के मशीन वोट उगलती है तब पता चलता है इसने वीर्य निगला इन्सान का और बच्चा जना वराह का।
      यह यथार्थ नज़र अंदाज़ करना आसान नही है कि नेहरू ने विपक्ष को जीवित रखने का हमेशा प्रयास किया है। वह फैबियन समाजवादी नेता थे। फुल नही फ्लॉ डेमोक्रेसी के पक्षधर थे। चुनाव की प्रक्रिया देश आज़ाद होने के बाद ही पक्षपात पूर्ण शुरू हुई है ऐसा भी नही है। कांग्रेस द्वारा 1929 में लाहौर में आयोजित अधिवेशन में 30 दिसम्बर को नेहरू जी ने अपने प्रबोधन में पूर्ण स्वराज की मांग का प्रस्ताव ज़ोरदार तरीके से उठाया , तिथि निर्धारित किया कि 26जनवरी 1930 तक यह लक्ष्य वह हासिल कर लेंगे। 
       जो कांग्रेस पूर्ण स्वराज की मांग पर अड़ी थी उसी कांग्रेस ने 1946 में संविधान सभा के लिए चल रहे चुनाव में डॉ अम्बेडकर को हराने के लिए सरदार वल्लभ भाई पटेल को मोर्चे पर लगा रखा था। ताकि डॉ अम्बेडकर संविधान सभा में पहुंचने से वंचित रहें। पटेल ने बॉम्बे प्रेसीडेंसी के प्रधानमंत्री बी जी खेर से मिलकर चुनाव में जबरदस्त धांधली कराई और डॉ अम्बेडकर को संविधान सभा में पहुंचने से रोकने का हर यत्न किया। उन्होने बयान दिया कि हमने डॉ अम्बेडकर के संविधान सभा में पहुंचने के सभी दरवाजे ही बन्द नही किये है अपितु खिड़कियों और झरोखों को भी पूरी तरह से नट बोल्ट से टाईट कर दिया है
    इस घटना का उल्लेख प्रासंगिक न होने के बावजूद इसलिए उद्धृत किया ताकि निष्पक्ष समीक्षा को एकांगी न बनने दिया जाए। भारत गणराज्य बनने से पहले बरतानवी औपनिवेश/निर्भरता को लम्बे समय तक झेलता रहा। 15 अगस्त 1947 से पहले हम उपनिवेश के अंग थे। 18 जुलाई 1947 को ब्रिटिश  ने इंडियन इंडिपेंडेंस एक्ट पास किया जिसमें निर्धारित किया गया कि भारत में यह कानून 15अगस्त को लागू होगा। 15अगस्त 1947 से लॉर्ड माउंटबैटन वायसरॉय/ गवर्नर जनरल का ओहदा बदल कर सिर्फ़ गवर्नर जनरल तक सिमट गया। यथा अब वह सिर्फ हमारे सहायक थे, ताकि संविधान निर्माण की प्रक्रिया में आवश्यकतानुसार सहायता करते रहें। हम उपनिवेश से निकलकर संरक्षित राज्य में सम्मिलित हो गए। माउंटबेटन 21जून 1948 तक भारत के गवर्नर जनरल रहे। 21जून 1948 को जब हमारा देश डोमिनियन राज्य बन गया तब चक्रवर्ती राजगोपालाचारी ने 25जनवरी 1950 तक इस गौरवपूर्ण दायित्व को गवर्नर जनरल के तौर पर निभाया।
       26 जनवरी 1950 को जैसे ही भारत का संविधान विधिक तौर पर लागू हुआ भारत गणराज्य बन गया। संविधान को भारत ने 26 नवम्बर 1949 को ही अंगीकृत अधिनियमित और आत्मार्पित कर लिया था। नेहरू जी के लाहौर अधिवेशन के कथन को ध्यान में रखते हुए इसे विधिवत 26जनवरी 1950 को विधिक बनाकर भारत को गणराज्य के सम्मान से प्रसादित किया गया। उसी दिन डॉ राजेन्द्र प्रसाद देश में अंतरिम राष्ट्रपति बन गए। अब हमारा देश एक सम्प्रभु देश बन गया यानि भारत गणराज्य बन गया। प्रश्न यह है कि हमारे देश में बनने वाले कानून क्या देश के नागरिकों की मर्ज़ी से बनते हैं? यदि नही तो येन केन प्रकारेण चुनाव में बहुमत हासिल करने वाली पार्टी का नेता जो कि प्रधान मंत्री के गौरवपूर्ण कार्यालय पर कब्ज़ा कर लेता है, अपनी मनमानी को ही देश के नागरिकों को स्वीकार करने पर बाध्य करता है? यह निरंकुशता असहनीय है गणराज्य की संकल्पना पर चुनी हुई सरकार के तानाशाही दम्भ का जोरदार तमाचा है। भारत गणराज्य इस गन राज्य की यातना मुक्त होने की याचना कर रहा है।
     लोकतंत्र में सरकार कैसी होगी यह निर्णय चुनाव की प्रक्रिया पर निर्भर है। यदि चुनाव स्वतन्त्र और निष्पक्ष हुए तब सरकार के निरंकुश होने की संभावना क्षीण होती है। हां यदि चुनाव में धनबल बाहुबल का इस्तेमाल हुआ तब तो सरकार द्वारा नागरिकों के अहित में लिए गए हर निर्णय को उपलब्धि के रूप में परोसने की मनोवृत्ति प्रदर्शित होगी। हैं न कमाल! देश के नागरिकों के टैक्स के पैसे को उड़ाकर प्रचार तन्त्र के माध्यम से सरकार उन्हीं नागरिकों को कटघरे में खड़ा करती है जिनके आदेश ने उन्हें एक प्रतिनिधि के रूप में सरकार चलाने का जनादेश दिया है।
          टी एन शेषन का मुख्य चुनाव आयुक्त का 2001-2004 तक का कार्यकाल एक ऐसा समय रहा है जब देश में चुनाव आयोग को सम्मान की दृष्टि से देखा गया है अन्यथा हमेशा धृतराष्ट्रों ने ही चुनाव आयोग की भूमिका निभाई है। कल्पना करें जहां चुनाव आचार संहिता के समय नही बल्कि ख़ास चुनाव के दिन एक व्यक्ति जिसे देश में कानून अनुपालन का आदर्श प्रस्तुत करना चाहिए, वह रोडशो कर रहा हो और सूरदास चुनाव आयोग ठर्रा लगा गहरी नींद में सो रहा है, क्या उस देश को सम्पूर्ण लोकतन्त्र कहा जा सकता है? बेहतर होगा कि चुनावी अभिनय से सात्विक और वास्तविक चुनावी प्रक्रिया को देश में लागू कराने के लिए नागरिकों को क़मर कस तैयार हो जाना चाहिए। अन्यथा सम्भव है गणतंत्र को लोकतन्त्र के सैयाद अल्पतन्त्र में बदलने में सफ़ल हो जायेंगे।  देश के फ़ोर्स को हमें अपने अधीन रखने की सनक में गन तन्त्र में तब्दील होता देश इससे प्रवृत्ति से निजात पाने की कब तक याचना करेगा?

लेखक: मनोज कुमार सिंह प्रवक्ता 
बापू स्मारक इंटर काॅलेज दरगाह मऊ 
उप सम्पादक- कर्मश्री मासिक पत्रिका

और नया पुराने