आज़मगढ़: जब लोकतंत्र की परिभाषा पढ़ी थी, तब यही समझ आया था कि सरकार जनता के लिए काम करती है। लेकिन जब सगड़ी तहसील का हाल देखा, तो यह भ्रम भी टूट गया। यहां तो लोकतंत्र नहीं, बल्कि "ठेकातंत्र" चलता है। अफसर मौन हैं, ठेकेदार कानून लिख रहा है, और फरियादी को न्याय मिलने से पहले ही पार्किंग शुल्क चुकाने का फरमान सुना दिया गया है।
सगड़ी तहसील, जहां हजारों लोग अपनी फरियाद लेकर आते हैं, वहां अब न्याय से पहले "एंट्री फीस" देनी होगी। वाहन खड़ा करने का ठेका दिया गया था, लेकिन ठेकेदार ने पूरा तहसील परिसर ही किराए पर उठा लिया है! मेन गेट पर रस्सी बांधकर यह संदेश दे दिया गया है—"कानून-व्यवस्था जाए भाड़ में, यहां सिर्फ ठेकेदार की चलेगी।"
तहसील या टोल प्लाजा?
अब फरियादी तहसील जाने से पहले सोचने लगा है—पेट्रोल भरवाएं या पार्किंग फीस बचाएं? न्याय की लड़ाई लड़ें या ठेकेदार की दादागिरी से जूझें? तहसील में घुसने से पहले ही बाइक-साइकिल वालों को रोका जाता है, और उनसे जबरन वसूली की जाती है। अफसर आराम से AC में बैठकर यह तमाशा देख रहे हैं, क्योंकि ठेकेदार का हिस्सा सब तक पहुंच जाता है।
CM की मंशा बनाम सगड़ी का ठेकातंत्र
योगी सरकार की मंशा थी कि न्याय गरीबों की चौखट तक पहुंचे। लेकिन सगड़ी में तो गरीब को तहसील की चौखट तक पहुंचने ही नहीं दिया जा रहा! "न्याय चला निर्धन के द्वार" का नारा अब "निर्धन दूर भाग तहसील के द्वार" में बदल चुका है।
अब सवाल यह है—क्या तहसील में आने वाला हर व्यक्ति अमीर हो गया है, जो उससे पार्किंग का टैक्स वसूला जा रहा है? अगर न्याय के लिए तहसील आना ही इतना महंगा हो गया, तो फिर गरीब इंसान अपनी फरियाद लेकर कहां जाएगा?
क्या कोई सुनेगा?
सरकारें भले ही गरीबों के लिए योजनाएं बनाती रहें, लेकिन जब तक तहसील जैसे संस्थानों में ठेकेदारी राज खत्म नहीं होगा, तब तक गरीब को न्याय नहीं मिलेगा। यह मामला सिर्फ सगड़ी तहसील तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे सिस्टम पर एक कड़ा तमाचा है। सवाल उठता है कि क्या CM योगी आदित्यनाथ तक यह खबर पहुंचेगी? या फिर ठेकेदार और अफसरों की मिलीभगत गरीबों की आवाज़ को हमेशा के लिए दबा देगी?
फिलहाल, तहसील के मेन गेट पर लगी रस्सी सिर्फ रास्ता नहीं रोक रही, बल्कि लोकतंत्र, कानून और न्याय का गला भी घोंट रही है।