लेख।
लेख। श्री गाँधी पीजी कॉलेज मालटारी में पूर्व प्राचार्य रहे स्व० डॉ० जगदीश प्रसाद पांडेय की आज पुण्यतिथि है, 3 अगस्त 2018 को इनका निधन हो गया था। डॉ जगदीश प्रसाद पांडेय एक बेहद ही सहज और कर्तव्यपरायण व्यक्ति थे, आज भी उनके व्यक्तित्व ने ऐसी छाप स्थानीय लोगों के बीच छोड़ी है जिसमें आज भी वो जीवंत हैं।
उनके जीवन से सम्बंधित कुछ यादगार पलों को उनके नाती एडवोकेट प्रणव द्विवेदी सुभम ने अपने शब्दों में पिरोकर उन्हें और भी प्रासंगिक बना दिया है।
( एडवोकेट प्रणव द्विवेदी शुभम द्वारा लिखा गया भावुक लेख)
#नाना
अर्थात स्वर्गीय मेजर डाक्टर जगदीश प्रसाद पांडेय। पूर्व प्राचार्य महात्मा गांधी स्नातकोत्तर महाविद्यालय मालटारी। नाम का छोटा स्वरूप जेपी था और व्यवहार से भी सचमुच बेखौफ क्रांतिकारी। जबतक जिए तबतक अनुशासन के साथ रहे रोज का लंबा टहलना अखबार पढ़ना सबकुछ। बच्चों के बच्चों वाली पीढ़ी में मैं सबसे बड़ा था तो स्नेह का बड़ा हिस्सा मुझे खूब मिला। मालटारी की अधिकांश दुकानों पर या तो उन्हें अधिकार था अपने खाते में उधार चढ़वाने का या बाद के दिनों में यह मुझे मिला। 2001 में बाबा के परलोक पहुंच जाने के बाद नाना की उंगली पकड़कर ही बहुत कुछ सीखा मसलन बीबीसी सुनना अखबार पढ़ना राजनीति की समझ और कर्तव्यपरायणता। तकरीबन 2007-8 के आस पास मालटारी वाला ननिहाल छूट गया और वहीं से चीजें बदलनें लगीं। मैं बड़ा होता गया और ननिहाल छूटता गया। ममेरे मौसेरे भाई बहनों का आगमन अपने क्रम में रहा और नाना भी महादेवपुरम गोरखपुर के नागरिक हो गये।
धीरे धीरे स्वास्थ्य ने उनका साथ छोड़ना शुरू किया मगर उनकी नियमित दिनचर्या ने उन्हें लंबे अरसे तक बनाए रखा। फिर नियमित रूप से वो लखनऊ जाने लगे इलाज हेतु उस दरम्यान गोरखपुर में विद्यार्थी जीवन में था और मुझे नाना की सेवा के माध्यम से वो कर्ज चुकाने का अवसर मिलता रहा। पीजीआई से लगाए चंद्रा तक के वहां शायद ही जाने में कभी आना कानी होगी क्योंकि बुढ़ापे की लाठी बनने का अपना ही सुख है। नाना के स्नेह के सबसे बड़े हिस्से के हकदार हम और हमारी बड़ी ममेरी बहन मनी ही रही।
अब नाना नहीं हैं तो और ननिहाल कम होता गया लखनऊ भी कम हो गया। नानी की चिरौंजी किसमिस और चोरौंधे का कर्ज अब मैं भी व्यस्तता में चुका नहीं पाता हूँ।
नाना का अक्श अब मामाओं में बंट चुका है जो कि अवरोही क्रम में मामाश्री लोगों में शेष है।
विश्वविद्यालय के दिनों में बदमाशियों से उपजी समस्याओं को नाना यूं तो चुटकी में निपटा देते थे मगर कभी इस हेतु प्रोत्साहित नहीं किया।
नहीं पता यह सब क्यूं लिख रहा हूँ मगर सहसा ज्यों वाट्सैप पर मंझले मामा की भेजी तस्वीर देखी बरबस बहुत कुछ याद आ गया।
शायद अब होते तो धीरे धीरे सुधर रहे शुभड़ी की कभी पीठ थपथपाते नाना।
हास्पिटल में आंखों के सामने जाते देखा है नाना।
यह सब लिखकर पोस्ट कर संभवतः उपहास का पात्र बनूं
क्योंकि यह तथाकथित सभ्य समाज अब बुजुर्गों के जाने.की खुशियां मनाता है।
जो कभी बाबा दादी नाना नानी से कुछ सीखे नहीं वे समझेंगे भी नहीं।
अश्रुपूरित नयनों से श्रद्धांजलि नाना।