लेख: मनोवैज्ञानिक, सांस्कृतिक ,अनौपचारिक और रहस्यात्मक रूप से राष्ट्रवाद का विचार सिंधु के छोर से लेकर सूदूर दक्षिण में कन्याकुमारी तक हर भारतवासी के हृदय में वैदिक काल से हृदयंगम रहा है। वेद की ऋचाओं में राष्ट्रदेवी का विचार मिलता है। प्रकारांतर आध्यात्मिक और सांस्कृतिक रूप से राष्ट्रवाद का विचार भारतीय बसुंधरा पर अत्यंत प्राचीन काल से पाया जाता हैं। परन्तु भारत में आधुनिक स्वरूप वाले मौलिक, मूर्त, वास्तविक, संवैधानिक, वैज्ञानिक और औपचारिक राष्ट्रवाद का विचार तथा स्वरूप ब्रिटिश साम्राज्य से संघर्ष करते हुए मजबूत हुआ और स्पष्ट रूप से निखर कर आया। अपनी मातृभाषा, मातृभूमि और अपनी मौलिक पहचान के लिए अपना सर्वस्व समर्पित करने की साहसिक चेतना प्रायः विश्व के प्रत्येक मानव समाज में पाई जाती रही है। यह ऐतिहासिक तथ्य है कि - भारतीय राजा एक दूसरे को नीचा दिखाने के लिए परस्पर युद्ध करते रहते थे। परन्तु बाह्य आक्रमण होने पर कोई न कोई शासक अपनी मातृभूमि के लिए जी-जान से अवश्य लड़ता रहा। भारत में चन्द्रगुप्त मौर्य, चन्द्र गुप्त विक्रमादित्य और समुद्र गुप्त जैसे पराक्रमी राजा भी हुए जिन्होंने बाह्य आक्रमणकारियों को न केवल करारा जबाव दिया बल्कि भारतीय सरहदो को विस्तार देते हुए पूरे भारत को एकसूत्र में पिरो दिया।
ऐतिहासिक दृष्टि से आधुनिक अर्थों में राष्ट्रवाद का विचार और स्वरुप उदय यूरोप में विशेष कर फ्रांसीसी क्रांति से माना जाता है । भारतीय राष्ट्र वाद के निर्माण और यूरोपीय राष्ट्रवाद के निर्माण में कुछ बुनियादी अंतर है । जहां यूरोप के अधिकांश देशों में राष्ट्रवाद का विचार और राष्ट्र -राज्य का निर्माण आर्थिक और सामाजिक पुननिर्माण की प्रक्रिया के तहत हुआ । यूरोप में निरंकुश शासको के अत्याचार के विरुद्ध व्यापक संघर्ष करते हुए और स्वतंत्र नागरिक जीवन एवं सभ्य समाज बनाने की गरज से हुआ। वहीं भारत सहित तिसरी दुनिया के अधिकांश देशों में राष्ट्रवाद का निर्माण साम्राज्यवादी शक्तियों से संघर्ष के दौरान देश में रहने वाले विविध धर्मो, जातियों, समुदायो, वर्गों भाषा भाषियों के मध्य उत्पन्न व्यापक समझदारी और आपसदारी के फलस्वरूप हुआ। स्वाधीनता आंदोलन के दौरान उत्पन्न यह समझदारी और आपसदारी भारतीय जनमानस की महान धरोहर है और वर्तमान दौर में देश के सामने मौजूद चुनौतियों से निपटने तथा समस्याओं के समाधान में सहायक हो सकती है। वास्तव में भारतीय राष्ट्रवाद का अभ्युदय ब्रिटिश साम्राज्यवाद के आधिपत्य के भारतीयो की सामूहिक चुनौती के रूप में हुआ। भारतीय भूभाग पर ब्रिटिश सरकार का शिकंजा जैसे -जैसै मजबूत होता गया वैसे-वैसे ब्रिटिश साम्राज्य के हितों और व्यापक जनता के हितों में टकराव बढ़ता गया। जैसे -जैसै टकराव बढ़ता गया वैसे-वैसे स्वाधीनता आंदोलन प्रखर होता गया।
सत्रहवीं शताब्दी में सम्पन्न औद्योगिक क्रांति ने इंग्लैंड को आर्थिक, सामरिक और राजनीतिक रूप अत्यंत शक्तिशाली बना दिया। इसके विपरित सम्पूर्ण भारत में राजनीतिक अस्थिरता, सामाजिक जर्जरता और सांस्कृतिक पिछड़ापन स्पष्ट रूप से देखने को मिलता है। भारत की राजनीतिक अस्थिरता को देख कर व्यापार करने की मंशा से भारत में प्रवेश करने वाली ईस्ट इंडिया कंपनी की महत्वाकांक्षऐं आसमान में हिलोरे लेने लगी। आर्थिक शोषण को मुख्य लक्ष्य बनाकर भारत में ब्रिटिश शासन की स्थापना व्यवस्थित ढंग से दक्षिण के आंग्ल -फ्रांसीसी युद्धो ( 1740- 1763 ) , प्लासी प्लासी की लड़ाई, ( 1757) , तथा बक्सर के युद्ध ( 1764) और मुगल बादशाह शाह आलम द्वारा ईस्ट इंडिया कंपनी को दिवानी अधिकारो को दिए जाने (1765) के साथ - साथ आरंभ हूई। यूरोपीय महाशक्तियों में सबसे शक्तिशाली ब्रिटिश साम्राज्य ने भारत में बेहतर शासकीय दक्षता, उच्च कूटनीतिक क्षमता तथा अत्यधिक शक्तिशाली सैनिक शक्तियों के साथ प्रवेश किया और भारतीय राजनीति में प्रलय मचा दिया। क्लाइव, वारेन हेस्टिंग, वैलेजली, हेस्टिंग और डलहौजी जैसे कुशल नेतृत्वकर्ताओं के नेतृत्व में ईस्ट इंडिया कंपनी ने लगभग भारत की समस्त शक्तियों को धाराशाई कर अपना शासन स्थापित कर लिया। सम्पूर्ण विश्व के इतिहास एक रोचक परिघटना है कि - भारत पर लगभग सौ साल तक ( 1765 से 1857 तक) एक विदेशी कंपनी ने शासन किया। 1857 से 1947 तक ब्रिटिश क्राउन का शासन था। कम्पनी और क्राउन के भारत पर शासन का लगभग दो सौ वर्षों के इतिहास का निष्पक्षता से विश्लेषण किया जाए तो यह विश्व के इतिहास में निर्मम और निर्लज्ज आर्थिक लूट-खसोट , घिनौनी घटिया साजिशों षड्यंत्रों और मानवता को शर्मसार करने वाला बर्बर दमन चक्र वाला शासन था।
निर्मम और निर्लज्ज आर्थिक लूट-खसोट, घिनौनी साजिशों तथा षड्यंत्रों एवं बर्बर दमन चक्र पर आधारित ब्रिटिश साम्राज्य के विरुद्ध हिन्दुस्तानियों का संघर्ष आरम्भिक दौर में छिटपुट एवं अलग -अलग परन्तु परवान चढ़ते- चढ़ते समेकित, व्यापक और राष्ट्र व्यापी स्वरूप धारण करने लगा। आरम्भिक दौर में आदिवासियों, किसानों, मजदूरों, सिपाहियों, हस्तकला के माध्यम से जौहर दिखाने वाले कारीगरों, महिलाओं और राजे - रजवाड़ों और रियासतदारों के छिटपुट संघर्ष तथा आंदोलन चलते रहे परन्तु 1957 तक आते -आते सभी आंदोलन और संघर्ष समेकित, एकीकृत, प्रखर और राष्ट्र व्यापी स्वरूप धारण कर लिये। 1857 महान स्वतंत्रता संग्राम में जम्मू-कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक व्यापक एकता देखने को मिलती हैं।लगभग दो सौ साल तक चलने वाले सभी आंदोलनों और संघर्षों के दौरान हमारे महान स्वाधीनता संग्राम सेनानियों ने जिन आदर्शों, मूल्यों, मान्यताओं, परम्पराओं और विचारों को स्थापित करने का अद्वितीय प्रयास किया , वह सभी हमारी अनमोल विरासत है । भारतीय स्वाधीनता संग्राम उच्च कोटि के त्याग, बलिदान, अदम्य साहस और अद्भुत शौर्य के साथ लड़ा गया जो हर भारतवासी को अपनी मातृभूमि के लिए त्याग, बलिदान और साहस के साथ संघर्ष के लिए प्रेरित करता रहता है। हमारे महान स्वाधीनता संग्राम सेनानियों ने राजनीति को त्याग, तपस्या, बलिदान और नि: स्वार्थ भावना से जनसेवा का विषय माऩा । स्वाधीनता आंदोलन के दौरान सच्चाई, ईमानदारी , साफगोई, सच्चरित्रता, बचनबद्धता और सादगी से परिपूर्ण जीवन शैली अपनाना एक राजनेता के लिए अनिवार्य शर्त थी।
स्वाधीनता प्राप्ति के समय से लेकर लगभग नब्बे के दशक तक भारतीय राजनीति त्याग, तपस्या, बलिदान और जनसेवा से ओतप्रोत रही परन्तु नब्बे के दशक से भारतीय राजनीति लगभग सिद्धांत विहिन, विचार विहिन और मूल्य विहिन होने लगी तथा त्याग, तपस्या, बलिदान और जनसेवा की भावना से कोसों दूर होने लगी। आज भारतीय राजनीति निजी और संकीर्ण दलीय हितों को साधने और अपने दौलत के विशाल साम्राज्य को बढ़ाने का साधन बनती जा रही है। भारतीय राजनीति में धनबल, बाहुबल , अपराध और भ्रष्टाचार का प्रभाव उत्तरोत्तर बढ़ता रहा है । राजनीतिक दलों के घोषणा पत्र भोली-भाली जनता की आंख में धूल झोंककर वोट उगाहने का भद्दा औजार बनते जा रहे हैं। संसद और विधानसभाओं में अरबपतियों, बाहुबलियों, अपराधियों और भ्रष्टाचारियों की तादाद चुनाव दर चुनाव बढ़ती जा रही हैं। यहां तक कि - समाज के विविध क्षेत्रों के मर्मज्ञो , साहित्यकारों, समाजसेवियों को प्रतिनिधित्व देने की पवित्र भावना से स्थापित राज्य सभा और विधान परिषदो में भी धन्नासेठ , बाहुबली और अपराधी निर्वाचित होकर पहुंचने लगे। ऐसे दूषित और प्रदूषित होते राजनीतिक परिवेश में महात्मा गांधी, सुभाष चन्द्र बोस, शहीद -ए- आज़म भगत सिंह, चन्द्र शेखर आजाद, डॉ भीम राव अंबेडकर, पंडित जवाहरलाल नेहरू, सरदार वल्लभ भाई पटेल और लाल बहादुर शास्त्री जैसे अनगिनत महान स्वाधीनता संग्राम सेनानियों के व्यक्तित्व कृतित्व और जीवन चरित्र का बोध एवं दिग्दर्शन वर्तमान दौर के राजनेताओं और समाज को कराया जाए तो निश्चित रूप से भारतीय राजनीति और भारतीय लोकतंत्र को दिशा मिल सकती हैं।
जिस तरह फ्रांसीसी क्रांति की कोख से उपजा स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व का विचार सम्पूर्ण विश्व में फ़ैल गया एवं जिस तरह रूस की क्रांति से शोषण विहिन और वर्ग विहिन समाज का विचार पुरी दुनिया में फैल गया, उसी तरह साम्राज्यवाद, नस्लवाद, प्रजातिवाद के विरुद्ध संघर्ष का विचार, सत्य और अहिंसा पर आधारित सत्याग्रह का विचार एवं शांतिपूर्ण सह अस्तित्व की अवधारणा पर अवलम्बित दुनिया का विचार भारतीय स्वाधीनता संग्राम की कोख से उपजा और सम्पूर्ण विश्व में फ़ैल गया। इसीलिए विश्व के कुछ इतिहासकार भी यह स्वीकार करते हैं कि - भारतीय स्वाधीनता आंदोलन केवल भारत को गुलामी से मुक्ति का आंदोलन नहीं था बल्कि विश्व में महान मानवतावादी मूल्यो और विचारो को स्थापित करने वाला आंदोलन था। पुरी दुनिया को सभ्यता का पाठ पढ़ाने का दावा करने वाले अंग्रेजो ने अपने तिसरी दुनिया के उपनिवेशों को घृणित रंगभेद की नीति के भयावह तथा वीभत्स रूप से रंग दिया था। मनुष्यता को कलंकित करने वाली इस रंगभेद नीति का महात्मा गांधी ने प्रखरता से विरोध किया। इस आंदोलन ने न केवल ब्रिटिश साम्राज्य सम्पूर्ण बल्कि विश्व को झकझोर कर रख दिया। महात्मा गांधी के इस ऐतिहासिक आंदोलन ने दुनिया में प्रजातिवाद, नस्लवाद और रंगभेद विरोधी आंदोलनों को गति और दिशा प्रदान किया। आजादी अमृत महोत्सव में स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर त्याग, तपस्या,बलिदान, साहस, पराक्रम और शौर्य से भरे-पूरे महान स्वाधीनता आंदोलन का स्मरण करते हुए सशक्त, स्वच्छ और स्वस्थ भारत बनाने का संकल्प लें।
जय हिन्द जय भारत
मनोज कुमार सिंह
लेखक/साहित्यकार/ उप सम्पादक कर्मश्री मासिक पत्रिका