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19 जुलाई को फिर रोएगी सगड़ी, जब याद आएगा अपना ‘शेर’ सर्वेश सिंह ‘सीपू’ 🕯️


आज़मगढ़।

रिपोर्ट: वीर सिंह

13 साल बाद भी हर दिल में जिंदा हैं सर्वेश सिंह ‘सीपू’, पुण्यतिथि पर उमड़ेगा श्रद्धा का सैलाब

आज़मगढ़। कुछ मौतें सिर्फ एक व्यक्ति को नहीं छीनतीं, वे पूरे क्षेत्र की आत्मा को झकझोर देती हैं। कुछ चेहरे समय की धूल में खो जाते हैं, लेकिन कुछ नाम ऐसे होते हैं जो वर्षों बाद भी लोगों की आंखों में आंसू और दिलों में सम्मान बनकर जिंदा रहते हैं।

सगड़ी की धरती पर ऐसा ही एक नाम है पूर्व विधायक स्वर्गीय सर्वेश सिंह ‘सीपू’ का।

19 जुलाई 2026... यह तारीख कैलेंडर का सिर्फ एक दिन नहीं है। यह वह दिन है जब सगड़ी की फिजाओं में फिर यादों का दर्द घुल जाएगा। जब हजारों लोग उस जननेता को याद करेंगे, जिसे उन्होंने सिर्फ वोट नहीं दिया था, बल्कि अपने दिल में जगह दी थी। जिसे लोग आज भी प्यार से "सगड़ी का शेर" कहते हैं।

उनकी 13वीं पुण्यतिथि पर जीयनपुर स्थित उनके आवास पर श्रद्धांजलि कार्यक्रम आयोजित होगा। एक बार फिर श्रद्धा के फूल चढ़ेंगे, आंखें नम होंगी और यादों का कारवां उन दिनों की ओर लौट जाएगा, जब सीपू सिंह जनता के सुख-दुख में सबसे आगे खड़े दिखाई देते थे।



नेता नहीं, लोगों के दिलों की धड़कन थे सीपू

अमुवारी नरायनपुर गांव में जन्मे सर्वेश सिंह ‘सीपू’ को राजनीति विरासत में जरूर मिली, लेकिन जनता के दिलों में जगह उन्होंने अपने व्यवहार, साहस और जनसेवा से बनाई।

स्वर्गीय राम प्यारे सिंह जैसे बड़े राजनीतिक व्यक्तित्व के पुत्र होने के बावजूद उन्होंने अपनी अलग पहचान गढ़ी। वर्ष 2007 में जब वह सगड़ी विधानसभा से विधायक बने, तब लोगों ने उनमें सिर्फ एक जनप्रतिनिधि नहीं देखा, बल्कि अपना बेटा, भाई और संरक्षक देखा।

कहा जाता है कि सगड़ी में किसी गरीब की चौखट पर मदद की जरूरत पड़ती थी तो सबसे पहले जिस नाम की चर्चा होती थी, वह था सीपू सिंह

यही कारण था कि उनकी लोकप्रियता राजनीति की सीमाओं से बहुत आगे निकल चुकी थी। वह लोगों की भावनाओं का हिस्सा बन चुके थे।


19 जुलाई 2013... जब गोलियों ने पूरे पूर्वांचल को रुला दिया

फिर आया वह काला दिन...

19 जुलाई 2013।

एक ऐसी तारीख, जिसने सगड़ी ही नहीं बल्कि पूरे पूर्वांचल को गहरे सदमे में डाल दिया।

दिनदहाड़े चली गोलियों ने उस जननेता की जिंदगी छीन ली, जिसकी मौजूदगी लोगों को सुरक्षा और भरोसे का एहसास कराती थी। इस हमले में उनके करीबी भरत राय समेत अन्य लोगों की भी जान चली गई।

जैसे ही यह खबर फैली, पूरा इलाका स्तब्ध रह गया।

बाजारों की रौनक थम गई। गांवों में सन्नाटा छा गया। लोगों की आंखों में आंसू थे और दिलों में अविश्वास।

किसी को यकीन नहीं हो रहा था कि जो व्यक्ति कल तक हजारों लोगों के बीच खड़ा था, वह आज हमेशा के लिए खामोश हो चुका है।

उस दिन सगड़ी ने सिर्फ एक विधायक नहीं खोया था।

उसने अपना एक भरोसा खोया था...

अपना एक सहारा खोया था...

अपना एक ऐसा चेहरा खोया था, जो हर दुख-सुख में सबसे आगे दिखाई देता था।

समय बीत गया... लेकिन सीपू आज भी जिंदा हैं

तेरह साल गुजर गए।

नई पीढ़ियां बड़ी हो गईं।

राजनीति के चेहरे बदल गए।

लेकिन सगड़ी की चौपालों, चौराहों और लोगों की बातचीत में आज भी एक नाम उसी सम्मान के साथ लिया जाता है—सर्वेश सिंह ‘सीपू’।

आज भी बुजुर्ग उनकी कहानियां सुनाते हैं।

आज भी समर्थकों की आंखें उनकी चर्चा पर भर आती हैं।

आज भी लोग कहते हैं कि "ऐसे जननेता बार-बार पैदा नहीं होते।"

शायद यही वजह है कि उनकी पुण्यतिथि पर हर वर्ष हजारों लोग बिना किसी निमंत्रण के पहुंच जाते हैं। क्योंकि रिश्ते पोस्टरों और भाषणों से नहीं, दिलों से बनते हैं।

19 जुलाई को फिर नम होंगी आंखें

इस वर्ष उनकी स्मृति में दोपहर 3 बजे सुंदरकांड पाठ तथा शाम 6 बजे प्रसाद ग्रहण का आयोजन जीयनपुर स्थित आवास पर किया गया है।

पूर्व विधायक वंदना सिंह, बड़े भाई संतोष सिंह ‘टीपू’, परिवारजन, समर्थक, शुभचिंतक और क्षेत्र के हजारों लोग उन्हें श्रद्धासुमन अर्पित करेंगे।

लेकिन यह सिर्फ एक श्रद्धांजलि कार्यक्रम नहीं होगा।

यह यादों का महासंगम होगा...

यह श्रद्धा और भावनाओं का मिलन होगा...

यह उस जननेता को नमन होगा जिसकी अनुपस्थिति आज भी महसूस की जाती है।

19 जुलाई को जब जीयनपुर में श्रद्धांजलि के फूल चढ़ेंगे, तब शायद हजारों आंखें फिर भर आएंगी।

क्योंकि कुछ लोग दुनिया से चले जरूर जाते हैं, लेकिन लोगों के दिलों से कभी नहीं जाते।

सर्वेश सिंह ‘सीपू’ ऐसा ही एक नाम हैं...

जिन्हें मौत नहीं हरा सकी, जिन्हें समय नहीं मिटा सका और जिन्हें सगड़ी कभी भूल नहीं पाएगी।


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