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पुरवट(मोठ),रहट और ढेकु से सिंचाई के वो दिन:डॉ0अखिलेश चन्द्र

आज़मगढ़।

रिपोर्ट: वीर सिंह

लेख: अपने दौर के सिंचाई के उन यादगार पलों को याद करने के पहले हिन्दी फिल्मों के भारत कुमार यानी मनोज कुमार,आशा पारेख और प्राण अभिनीत फ़िल्म : 'उपकार'(1967)का सदाबहार गीत जिसे महेन्द्र कपूर जी ने अपनी आवाज दी थी ।इस गीत को संगीतबद्ध किया था कल्याण जी आनन्द जी ने और इस गीत को लिखा था गीतकार इन्दीवर जी ने गीत के बोल थे-'मेरे देश की धरती सोना उगले ,उगले हीरे मोती,मेरे देश की धरती।बैलों के गले में जब घुंघरू जीवन का राग सुनाते हैं, गम कोसों दूर हो जाते हैं खुशियों के कवल मुस्काते हैं,सुन के रहट की आवाजें यूँ लगे कहीं शहनाई बजे ,आते ही मस्त बहारों के दुल्हन की तरह हर खेत सजे।मेरे देश की धरती सोना उगले,उगले हीरे मोती,मेरे देश की धरती।।इस गीत को और इस फ़िल्म को मनोज कुमार जी ने पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री जी के नारे 'जय जवान जय किसान'को ध्यान में रखकर बनाया था जिस गीत को आज भी स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस के खास मौकों के अलावा हमेशा बड़े चाव से सुना जाता है।इस गीत के कारण इस फ़िल्म को फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार भी मिला था।
इस गीत के अंतरे में सुन के रहट की आवाजें यह आज हम लोगों के याद का विषय है।हालांकि रहट के पहले भी एक वस्तु सिचांई के लिये प्रयोग में चलन में थी और वो थी -पुरवट (मोठ)। इस वस्तु के बारे में पहले आप सभी यह जान लें कि पुरवट(मोठ) एक बड़े जानवर की खाल से अर्थात चमड़े से बना एक बड़ा बैग की तरह का खोल होता था जो स्त्रीलिंग शब्द से बना था।यह काफी मजबूत होता था इसमें 500-700 लीटर पानी एक साथ कुएं से निकाला जाता था।आजकल जो कुएं गाँव के चलन में तो कहीं-कहीं हैं पर उन पर मोठ से पानी निकालने का काम अब बन्द हो चुका है।आपने अपने गाँव में शायद कोई ऐसा कुआँ देखा हो जहाँ कुएं पर चौतरफा बाउंड्री के साथ एक साइड में दो पत्थर के बड़े-बड़े खम्भे लगभग 5-7 फीट की दूरी पर लगे हो और उन खम्भों के बीच एक मजबूत शाखू के पेड़ का औसतन 4-6इंच का बेलनाकार लकड़ी का बड़ा तना हो,इन तनों के बीच मे एक 2-3 फीट का लोहे का रॉड और रॉड में लकड़ी की गडारी जिस पर मोटी उबहन या नार चलने की खराद दिखलाई देगी।जिस तरफ कुएं पर खम्भा होगा उस तरफ कुएं की मुंडेर पर पत्थर की बड़ी-बड़ी दो पटिया ढलान के रूप में दिखेगी जिसका एक सिरा बन्द होगा और दूसरे सिरे से पानी खेत को जाएगा।हालांकि बनाते समय दोनों सिरे खुले रखे जाते हैं और जरूरत अनुसार हम एक सिरा मिट्टी से बन्द कर देते हैं और दूसरा सिरा खोलते हैं।आपको यह भी लग रहा होगा कि मोठ से जब इतना ज्यादा पानी कुएं से एक साथ निकालना होगा तो यह निकलेगा कैसे?यह प्रश्न जायज है।कुएं की तरफ जहां खम्भा है उस तरफ लकड़ी की गडारी से होते हुये नार या उबहन को हम मोठ में जिसमें एक लोहे का छल्ला लगा रहता था उसमें बांध देते थे और दूसरा सिरा गडारी से होते हुए इस काम में मदद के लिये दो बैलों की जोड़ी या कभी-कभी एक बैल के जुआट से बांधते थे और हमारे ये बैल एक आदमी की मदद से जो बैल को हांकता था उसके इसारे से उस कुएं के पवधर पर जो नीचे की तरफ जाता है पर ले जाते थे।जब बैल कुएं के पास आते थे तो मोठ कुएं के अंदर लगभग 20-30 फिट नीचे जाता था और पानी मोठ में भर जाता था और तब बैल हाँकने वाला बैल को पवधर पर हांकता था और बैल पवधर पर नीचे की तरफ आता था तब तक जब तक मोठ कुएं की मुड़ेल तक आ न जाय।मोठ के मुड़ेल पर आ जाने पर वहां एक आदमी उसे पकड़कर पानी को उड़ेलता था।यह काम बहुत कौशल का था सभी इस काम को नही कर पाते थे क्योंकि इस काम मे दक्षता के साथ-साथ तय समय में ही करना पड़ता था क्योंकि ज्यों ही नीचे गया बैल लौटने लगेगा आदमी मोठ सहित कुएं में गिर सकता था।पानी से भरा मोठ बहुत वजनदार होता था और बैक बाउंस भी करता था।इस काम में कुल तीन लोग के साथ एक या दो बैल की जोड़ी की जरूरत होती थी।आप सोच रहें होंगे दो आदमी तो समझ मे आ गए तीसरे आदमी का क्या काम,अरे भाई एक आदमी खेत में पानी क्यारी में देखने और भरने के लिये खेत में भी काम कर रहा होगा।यह काम दिनभर चलने पर 2 से 3 बिस्सा खेत में पानी भर पाता था इससे ज्यादा का काम दिनभर में नही हो पाता था।मैं इस काम के तीनों जगह पर काम करने में माहिर था।मेरे दादा जी मेरी ड्यूटी जहां भी लगा देते थे मैं उस जगह लग जाता था पर मेरी रुचि बैल हाँकने में ज्यादा होती थी क्योंकि बैल की रस्सी पर बैठना मुझे अच्छा लगता था और झूले का एहसास कराता था।जब तक दक्षता विकसित नही हुई थी तो बैल बैक ही लौटते थे लेकिन बाद में थोड़ा घुमाकर आने पर बैल दोनों तरफ सीधे-सीधे आने लगे।काम की अधिकता के दिनों में बैल को चारा भी उनके काम पर रहते हुए ही एक बड़े बैग में भरकर उनके गर्दन से टांग देते थे और वो चलते भी थे और साथ-साथ खा भी लेते थे।यही काम आदमी के लिये भी होता था या कभी-कभी काम रोककर भी खाना खाते थे।
जब गाँव का पुरवट चलता था तब गाँव के सारे लोग अपने लिये पानी का इंतजाम यहां से कर लेते थे।पुरवट किसी का भी हो पानी लेने की किसी को कोई मनाही नहीं थी।
अब आइए रहट की बात करते हैं।रहत पुरवट के बाद आया।यह थोड़ा विकसित था।इसमें एक बड़ा गोला लोहे का 1 या 1.5 फिट का मजबूत पत्तर और उस पत्तर पर एक पट्टा जिस पर 20-25 कनस्तर के बॉक्स जो एक निश्चित दूरी पर इस तरह लगे रहते थे कि एक साथ चल सके और कुएं में पानी भरकर ऊपर जब आएं तो आपस मे न टकराएं और बार बार चलते रहें।इस लोहे के गोल पत्तर को किसी माध्यम से दूसरी तरफ बैल से जोड़ा जाता था और बैल गोल-गोल घूमता था और रहट से पानी कुएं से निकलता था।इस काम मे 1 आदमी की जरूरत ही रह गयी और कुएं में गिरने से भी भय कम हो गया।इस काम से खेत भरने में कम समय लगने लगा और इसमें थोड़ी तकनीक के कारण बैल पर भी कष्ट कम हुआ।
रहट के साथ-साथ जो खेत नालों, या नहर से जुड़े होते थे वहां सिंचाई के लिये ढेकु का प्रयोग किया जाता था।ढेकु को एक बड़ी नाली नुमा लकड़ी से या लोहे के पत्तर से बनाते थे और उसे एक आदमी नहर के पानी में डुबाकर दूसरे खेत में पानी भरता था।इसके लिये एक ऊँचाई पर बांस बांधकर उससे सपोर्ट लिया जाता था।यह उन किसानों के लिये ज्यादा मददगार था जिनके पास बैल खरीदने के पैसे नही होते थे और उनका खेत नहर या तालाब के पास होता था।
इस तीन तकनीकी के बाद आया ट्यूबबेल का जमाना जो बिजली से संचालित होने लगे और धीरे-धीरे पुरवट,रहट और ढेकु का ज़माना खत्म होता चला गया और आज इतिहास बन गया।

लेखक-डॉ0 अखिलेश चन्द्र एसोसिएट प्रोफेसर शिक्षा संकाय श्री गाँधी पी जी कॉलेज, मालटारी,आजमगढ़

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