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आशा संगिनी कंचन पांडे बनी मसीहा।

आज़मगढ़।

रिपोर्ट: वीर सिंह

स्वयं की आर्थिक मदद, कराया सुरक्षित प्रसव।

चौथी बार गर्भवती की सहारा बनी “आशा” संगिनी कंचन पांडे

आशा के सार्थक प्रयास से सरिता के चेहरे पर आई मुस्कान     

आजमगढ़, 29 अक्टूबर 2021: ग्रामीण बस्तियों में रह रही गरीब गर्भवती महिलाओं की सबसे बड़ी सहारा हैं आशा दीदी।  घर के पास या कहीं भी मिल जाने पर नमस्ते दीदी कह कर अपना परिचय और सम्मान देना जो हर मुश्किल घड़ी में उन मलिन बस्तियों और छोटे – छोटे गाँव की गर्भवती महिलाओं के साथ खड़ी हैं।  आशा संगिनी और आशा कार्यकर्ता द्वारा स्वास्थ्य सम्बन्धी जानकारी व सुविधा उपलब्ध कराने के लिए मलिन बस्ती की महिलाओं का आशाओं को नमस्ते दीदी कहना एक परंपरा बन गयी है।     

गांव लोहरा ब्लॉक अतरौलिया आशा संगिनी कंचन पांडे की जुबानी-
मैं और आशा जब भी उस रास्ते से निकलती थी ,गर्भवती सरिता की  आवाज जरूर सुनाई दे जाती की नमस्ते दीदी और मैं वही रुक जाती, और उसका हाल-चाल लेती थी| उसके पहले जब मैं आशा थी तो पहला, दूसरा व तीसरे बच्चे में उसके साथ हमेशा खड़ी रही | उसके सुख-दु:ख  में शामिल होती थी पहले प्रसव में बहुत परेशानी थी।  उसकी देखभाल करने वाला कोई नहीं था| उसे हिम्मत दी की मैं उसके साथ हमेशा खड़ी हूँ तुम्हें कुछ नहीं होगा | चार जांच करवाई, टीटी के इंजेक्शन, आयरन की गोली उसके घर जाकर देती थी | खान-पान पर ध्यान देने की लिए अपनी तरफ से भी सहयोग किया करती थी | जब 9 माह की गर्भवती हुई तो डॉक्टर ने कहा कि यह प्रसव यहां नहीं हो सकता | पैसों की तंगी के कारण सरिता घबरा गई थी मैं उसे बहुत समझायी  कि मैं हूं घबराने की जरूरत नहीं है| अभी 15 दिन का समय है खाने-पीने पर ध्यान देने की जरूरत है | जब प्रसव पीड़ा हुई तो मैं एंबुलेंस बुलवायी और सीएचसी पर लेकर गयी | डॉक्टर ने कहा इसका प्रसव यहाँ नहीं हो सकता | यहां से ले जाओ तो क्यों नहीं ले जाती तब मैं डॉक्टर से कहीं बहुत गरीब है| और अकेली भी है इसलिए थोड़ा कोशिश करें हम और आशा भी सहयोग कर देंगे।  डॉक्टर ने हमारा साथ दिया और सीएचसी पर सुरक्षितप्रसव (लड़का) हुआ।  प्रसव के दौरान सभी को डर था | लेकिन प्रसव के उपरांत सबके चेहरे पर मुस्कान आ गई मैं कभी नहीं भूल पाती हूँ इस सार्थक प्रयास को। इसी तरह दूसरा व तीसरा बच्चा हुआ सहयोग करती रही| बीच-बीच में नसबंदी के लिए अस्थाई साधन के बारे में बताती पर सरिता ने नसबंदी नहीं कराया था| सरिता अब चौथी बार गर्भवती हुई नयी आशा की नियुक्ति हो गई थी | लेकिन रास्ते पर आते-जाते आशा के साथ गृह भ्रमण पर जाती तो वह जरूर बोलती नमस्ते दीदी और मैं अपने विजिट पर आगे निकल जाती थी। 
एक दिन मैं घर की सफाई कर रही थी, शाम का समय था उसे दूर से देखकर पहचान गई कि यह सरिता है| आँखें लाल और सूजी थी, पैरों में सूजन लग रही थी | रोती हुई आई बोली हमके बंचाय लेंय दीदी, वह झुक नहीं पा रही थी।  मैं पूंछी  हुआ क्या है बोली आशा के साथ दिखाने गई थी पर डॉक्टर ने कहा कि ऑपरेशन करवाना होगा | मैं समझायी थी कि बस एक सप्ताह रुक जाओ कुछ करते हैं,  लेकिन 3 दिन बाद  पुनः दर्द हुआ एंबुलेंस बुलाया उसे आशा के साथ लेकर सीएचसी पर गई|  और फिर सरिता को सुरक्षित प्रसव (लड़का) हुआ।  मेरी और आशा की सूझबूझ से आज जच्चा-बच्चा दोनों सुरक्षित हैं।  मां और बच्चे को देखकर हम सब के चेहरे पर फिर से खुशी थी| और फिर पीछे से आवाज आयी  नमस्ते दीदी। 
गांव लोहरा लाभार्थी सरिता ने बताया की मेरे तीन बच्चे हैं।  आज हम और हमारे बच्चे सिर्फ आशा संगिनी दीदी के कारण हैं।  बहुत गरीब परिवार से है, जब मैं गर्भवती थी, घर में खाने के लिए नहीं था तब आशा दीदी ने कई बार मेरी मद्द की | हरी सब्जी, फल भी लाकर देती थीं।  दीदी के कारण हम और मेरे बच्चे सभी स्वस्थ हैं।  दीदी स्वास्थ्य सम्बन्धी सभी जानकारी समय – समय पर देती रहती हैं।  आशा दीदी हमें भूल न जायें,  इसलिए जब भी जहां भी आशा दीदी हमें  मिलती हैं, तो मैं उन्हें नमस्ते दीदी कहती हूँ।

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