आज़मगढ़।
रिपोर्ट: वीर सिंह
आजमगढ़ 04 फरवरी-- थान सिहं गौतम, उप कृषि निदेशक (शोध/प्रभारी कृषि रक्षा) आजमगढ़ ने क्षेत्र का भ्रमण कर अवगत कराया है कि तापमान में कमी एवं आर्द्रता में वृद्धि के कारण गेंहॅू की फसल में पीला रतुआ एवं करनाल बन्ट रोग के प्रकोप की संभावना के दृष्टिगत निम्नलिखित सुझाव एवं संस्तुतियों को अपनायें।
सामान्यतया पीला रतुआ के प्रकोप हेतु 6 से 18 डिग्री सेंटीग्रेड तापमान एवं 90 प्रति0 से अधिक आर्द्रता के साथ-साथ बादलीयुक्त मौसम अनुकूल होता है। प्रायः इस रोग का प्रकोप जनवरी और फरवरी माह में दिखाई देता है। रोग का प्रकोप होने पर पीले से नारंगी रंग के युरेडियोस्पोर धारियों के आकार में पत्तियों पर पाउडर के रूप में दिखाई पड़ते हैं जिसे हाथ लगाने पर हाथों में पीला पाउडर चिपक जाता है। पीला रतुआ से बचाव हेतु नाइट्रोजन युक्त उर्वरकों का प्रयोग अधिक नहीं करना चाहिए तथा प्रकोप के लक्षण परिलक्षित होने पर प्रोपिकोनाजोल 0.1 प्रति0 अथवा टेबुकोनाजोल 50 प्रतिशत + ट्राईफ्लाक्सीस्ट्राबिन 25 प्रति0 डब्ल्यू0जी0 0.06 प्रति0 का घोल बनाकर 15 दिन के अंतराल पर छिड़काव करना चाहिए।
करनाल बन्ट रोग बीज एवं भूमि जनित रोग है, इसके प्रकोप की दशा में गेहूँ की बालियों एवं दानों पर काले रंग के पाउडर के रूप में टेलीयोस्पोर चिपके रहते हैं, जिसका प्रसार हवा द्वारा तेजी से होता है। यदि बीते वर्षों में इस रोग का संक्रमण रहा हो और मौसम रोग संक्रमण के अनुकूल हो तो फूल अवस्था के दौरान यथासंभव सिंचाई नहीं करनी चाहिए। गेहूँ की पुष्पावस्था में तापमान में गिरावट एवं अधिक आर्द्रता होने की स्थिति में बालियाँ निकलते समय प्रोपिकोनाजोल 0.1 प्रतिशत का सुरक्षात्मक छिड़काव करना चाहिए।