आज़मगढ़।
रिपोर्ट: गौरव सिंह राठौर
आजमगढ़ 06 मई-- वरिष्ठ कृषि रक्षा सहायक ग्रुप-ए, राजनाथ सिंह यादव ने बताया कि परम्परागत कृषि विधियों यथा-कतार में बुआई, फसल चक्र, सहपराली खेती, ग्रीष्म कालीन जुताई आदि कम लागत से गुणवत्तायुक्त उत्पादन प्राप्त करने के लिए महत्वपूर्ण है। इनको अपनाने से जल, वायु, मुदा व पर्यावरण प्रदूषण में व्यापक कमी होती। कीट एवं रोग नियंत्रण की आधुनिक विधा एकीकृत नाशीजीव प्रबन्धन (आईपीएम) के अन्तर्गत भी इन परम्परागत विधियों को अपनाने पर बल दिया जाता है। रबी फसल के कटाई के बाद खेत की गहरी जुताई आगामी खरीफ फसल के लिए अनेक प्रकार से लाभकारी है। ग्रीष्मकालीन जुताई मानसून आने से पूर्व मई-जून महीने में की जाती है।
उन्होने जनपद के किसान बन्धुओं को ग्रीष्मकालीन जुताई के मुख्य उद्देश्य के सम्बन्ध में अवगत कराया है कि ग्रीष्मकालीन जुताई करने से मृदा की संरचना में सुधार होता है, जिसमें मृदा की जलधारण क्षमता बढ़ती है जो फसलों के लिए अत्यन्त उपयोगी होती है। खेत की कठोर परत को तोड़कर मृदा को जड़ों के विकास के लिये अनुकूल बनाने हेतु ग्रीष्म कालीन जुताई अत्यधिक लाभाकारी है। खेत में उगे हुए खरपतवार एवं फसल अवशेष मिट्टी में दबकर सड़ जाते हैं तथा जैविक खाद में परिवर्तित हो जाते हैं। जिससे मृदा में जीवांश की मात्रा बढ़ती है। मृदा के अन्दर छिपे हुए हानिकारक कीड़े, मकोड़े, उनके अण्डे, लार्वा, प्यूपा एवं खरपतवारों के बीज गहरी जुताई के बाद सूर्य की तेज किरणों के सीधे सम्पर्क में आने से नष्ट हो जाते हैं, जिससे फसलों पर कीटनाशकों एवं खर-पतवारनाशी रसायनों का कम उपयोग करना पड़ता है। गर्मी की गहरी जुताई के उपरान्त मृदा में पाये जाने वाले हानिकारक जीवाणु, कवक, नेमेटोड एवं अन्य हानिकारक सूक्ष्म जीव मर जाते हैं, जो फसलों में मृदा जनित रोग के प्रमुख कारक होते हैं। निमेटोड का नियंत्रण करने हेतु कीटनाशकों का प्रयोग खर्चीला होता है, परन्तु ग्रीष्मकालीन जुताई से उनका नियंत्रण बिना किसी अतिरिक्त लागत के हो जाता है। मृदा में वायु संचार बढ़ जाता है, जो लाभकारी सूक्ष्म जीवों के वृद्धि एवं विकास में सहायक होता है। जिससे फसलों की गुणवत्ता में लाभ मिलता है। मृदा में वायु संचार बढ़ने से खर-पतवारनाशी एवं कीटनाशी रसायनों के विषाक्त अवशेष एवं पूर्व फसल की जड़ों द्वारा छोड़े गये हानिकारक रसायनों के अपघटन में सहायक होती है।
उक्त के क्रम उन्होने जनपद के समस्त प्रभारी कृषि रक्षा इकाई/सहायक विकास अधिकारी (कृषि रक्षा) को निर्देश दिया कि अपने-अपने पदास्थापित विकास खण्डों में कृषकों के मध्य व्यापक प्रचार-प्रसार करने के साथ ही ग्रीष्मकालीन जुताई के लाभ एवं उद्देश्यों के उपयोगिता से कृषकों को अवगत कराना सुनिश्चित करें।