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बहुत मुश्किल होता हैं एक साथ सबका मिलकर हँसना-‐

कविता।

बहुत मुश्किल होता है एक साथ मिलकर रोना 
और उससे भी 
 मुश्किल होता है एक साथ मिलकर हँसना,
इसलिए मुश्किल होता है एक साथ सबका इंसान होना ।
क्योंकि- लोग एक दूसरे की जाने या अनजाने में की गई  गलतियों, बेवकूफियों और नादानियों पर तो हँसते ही हैं परन्तु 
लोग तब भी हँसते हैं जब आप चलते-चलते लुढक जाते हैं,
या आप किसी गहरे गड्ढे और खाई गिर जाते हैं। 
लोग तब भी हँसते हैं जब बिछलाकर गिर जाते हैं। 
हम परदेशियों और विदेशियों पर हँसते और परदेशी विदेशी हम पर हँसते हैं। 
हम लोगों की पोशाक पर हँसते हैं और लोग हमारी पोशाक पर हँसते हैं। 
हम लोगो के खान-पान चाल-चलन पर हँसते हैं और लोग हमारे खान-पान और चाल चलन पर हँसते हैं। 
हम दुश्मनों के दुख दर्द पर हँसते हैं और दुश्मन हमारे दुख दर्द पर हँसते हैं। 
विक्रेता अपने बाजार की बाजीगरी पर हँसते हैं। 
उपभोक्ता सिर्फ अपनी खरीदारी की ताकत पर हँसते हैं 
जीता हुआ नेता अपनी वोट हथियाने की चतुराई पर हँसता है 
मतदाता अपनी किस्मत पर नहीं बल्कि हारे हुए नेता की किस्मत पर हँसता है 
चालाक लोग जब अपनी चालाकी की जाल में किसी भोले-भाले लोगों को फंसा लेते हैं 
तो वो अपनी चालाकी पर मुस्कराते है और भोले- भाले की मूर्खता पर हँसते हैं। 
दुनिया के चालाक लोगों का और भोले- भाले लोगों का एक हँसना कभी नहीं हो पाता है। 
चालाकियाॅ और नादानियाॅ जब एक साथ हँसने लगे 
कुछ विद्वानों की विद्वता और और अनपढो की अनपढता जब एक साथ हँसने लगे 
तब समझिए लोगों का एक साथ हँसना सम्भव हो सकेगा। 
और तभी सम्भव होगा दुनिया के लोगों का एक साथ इंसान होना। 

लेखक: मनोज कुमार सिंह
प्रवक्ता बापू स्मारक इंटर काॅलेज 
दरगाह मऊ।

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