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समरस, सहिष्णु और अहिंसक मानव समाज बनाना चाहते थे महात्मा गांधी।

लेख।

लेख: महात्मा गांधी उच्चकोटि के अनुशासित सत्याग्रही, सफल और विश्व विख्यात आन्दोलनकर्ता तथा  सच्चे राष्ट्रवादी थे जो स्वयं को विश्व का नागरिक समझते थे। दक्षिण अफ्रीका उनके सत्याग्रह , संघर्ष और आन्दोलन की पहली प्रयोगशाला थी जहाँ उन्होंने अपने सत्य और अहिंसा के सिद्धांतों का सफलतापूर्वक परीक्षण किया। दक्षिण अफ्रीका की रंगभेद और नस्लवादी समस्या के विरुद्ध संघर्ष ने महात्मा गांधी को वैश्विक मानवता का अमर संदेशवाहक बना दिया। बीसवीं शताब्दी के राजनीतिक आदर्श माल्थस, डार्विन, हर्बर्ट स्पेंसर और नीत्शे जैसे विचारकों के इस सिद्धांत से निर्धारित हो रहे थे कि- जीवशास्त्रीय नियमों के अनुसार शक्तिशाली की शक्तिहीनो पर विजय स्वाभाविक, प्राकृतिक और आवश्यक है। इसकी प्रतिक्रया में महात्मा गांधी ने वेदान्तियों, बौद्धों और स्टोइको की तरह ललकार कर कहा कि-अंततः विजय सत्य की होती हैं, न कि सबसे अधिक शक्तिशाली की। इसलिए महात्मा गांधी ने सर्जनात्मक अहिंसा के साथ-साथ सत्य का संदेश पुरी दुनिया को दिया। 1893 से लेकर 1914 तक महात्मा गांधी ने प्रजातीय श्रेष्ठता और नस्लीय श्रेष्ठता के विरुद्ध शानदार संघर्ष किया और यह सिद्धांत स्थापित किया कि- सब मनुष्य समान और स्वतंत्र हैं। महानताए किसी भी जाति-प्रजाति और भौगोलिक क्षेत्र पनप और फल- फूल सकती है । जातीय समानता के लिए महात्मा गांधी के इस संघर्ष ने उनको वैश्विक मानवता का अग्रणी अग्रदूत बना दिया तथा उस समय के सुविख्यात ईसाई विभूति सी एफ ऐंड्रूज को उनका परम भक्त बना दिया। 
  1915 से 1948 तक एक सच्चे और ईमानदार देशभक्त की तरह महात्मा गांधी ने देश की स्वाधीनता के लिए संघर्ष किया। इस संघर्ष के दौरान कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी गांधी ने अपने सत्य और अहिंसा के सिद्धांतों तथा अंतर्मन में समाहित मानवतावादी विचारों से कोई समझौता नहीं किया। साध्य के साथ-साथ साधन की पवित्रता बल देकर गांधी ने रणक्षेत्र और युद्ध की परम्परागत धारणाओं को क्रांतिकारी रूप से परिवर्तित कर दिया। हृदय परिवर्तन द्वारा दुश्मन को परास्त करने की संकल्पना ने महात्मा गाँधी को विश्व इतिहास में ऐसा अनोखा महायोद्धा बना दिया जिसे संकीर्ण विचारों वाला देशभक्त शक्ति , सत्ता और प्रभाव की उपासना करने वाले  राजनीतिज्ञ कभी हृदयंगम नहीं कर सकते हैं। 
       बचपन में ही राजा हरिश्चंद्र का नाटक देखकर महात्मा गांधी ने सत्य को अपने समग्र जीवन का सारतत्व बना लिया था और समग्र जीवन में सत्य के साथ दृढ़ता से खडे रहे। महात्मा गांधी ने भगवद्गीता की इस अभिव्यक्ति को आत्मसात कर लिया था कि- सत्य का एक कण असत्य के पर्वत से भी शक्तिशाली होता।  इसलिए उनके समग्र जीवन और समग्र संघर्ष में निश्छलता और ईमानदारी का स्पष्ट दिग्दर्शन होता हैं। सत्य के साथ अहिंसा के प्रति गांधी जी की भक्ति आश्चर्यजनक थी। इस भक्ति ने उन्हें आत्म-बलिदान की सर्वश्रेष्ठ भावना से लबालब लबरेज़ कर दिया था। उनके आत्म-बलिदान की भावना इस ऐतिहासिक तथ्य से प्रमाणित होती हैं कि- उन्होंने बंगाल के नोआखाली तथा बिहार के दंगा प्रभावित क्षेत्रों का दौरा अकेले बिना किसी सुरक्षा घेरा लिए बिना किया। 
   सात्विकता आध्यात्मिकता और नैतिकता में गहरी आस्था महात्मा गाँधी को उनकी धर्मपरायण माता से विरासत में मिले थे। लियो टालस्टाय की रचनाओं, महात्मा बुद्ध के जीवन, जैन धर्म की शिक्षाओं, भगवद्गीता, और रायचन्द्र भाई के सम्पर्क ने उनकी नैतिक मूल्यों के प्रति आस्था को और भी प्रगाढ कर दिया। इसलिए व्यक्तिगत जीवन, सामाजिक जीवन और राजनीतिक जीवन में नैतिक मूल्यों और नैतिकता पर महात्मा गांधी अत्यधिक जोर देते थे। नैतिक मूल्यों तथा सर्वोदय में महात्मा गाँधी का अखंड विश्वास था। इसलिए वह सार्वभौम प्रेम पर आधारित जीवन में आस्था रखते थे और आजीवन मानव और पशुओं की प्रति निर्दयता के विरुद्ध संघर्ष करते रहे। 
     गांधी जी का मानना था कि- मानव समाज उत्तरोत्तर अहिंसा की तरफ अग्रसर हो रहा हैं तथा इतिहास अहिंसा की श्रेष्ठता की पुष्टि कर रहा है। महात्मा गांधी के अनुसार अहिंसा पाप और दुष्कर्म के सामने समर्पण करने का नाम नहीं है, और न ही अपनी दुर्बलता छिपाने का ढोंग हैं। अहिंसा उस आत्मा की दृढ़ शक्ति का परिचायक हैं जो किसी जिवित प्राणी को इसलिए कष्ट नहीं पहुँचाता कि- हर प्राणी तत्वतः आत्मा है और वह स्वयं उसके साथ एक रूप है। अहिंसा के लिए यह अनिवार्य है कि- इसमें जो सबसे दुर्बल और अकिंचन हैं उसके भी अधिकारो की सावधानी से रक्षा की जाए। महात्मा गांधी अपने सत्य और अहिंसा के सिद्धांतों तथा सत्याग्रह की तकनीक द्वारा स्वस्थ समरस सहिष्णु और अहिंसक मानव समाज बनाना चाहते थे। 
गांधी दर्शन, गांधीवाद और गांधीवादी सिद्धांतों और विचारों की चर्चा-परिचर्चा लगभग हर चट्टी-चौराहे और नुक्कड़ पर होती है। यहाँ इतिहास के विद्यार्थी की हैसियत मै यह स्पष्ट कर देना चाहता कि- बकौल महात्मा गांधी न कोई गांधी दर्शन है, न कोई गांधीवादी विचार हैं और न कोई गांधीवादी सिद्धांत है। वस्तुतः महात्मा गांधी चरक सुश्रुत वराहमिहिर और आर्यभट्ट सरीखे गुफाओं और कन्दराओं में साधनारत योगी, सन्यासी और तपस्वी नहीं थे। इसके साथ  ही महात्मा गाँधी न तो किसी पुस्तकालय में बैठकर किसी कार्ल मार्क्स की तरह अध्ययनयार्थी और शोधार्थी थे। महात्मा गाँधी के दर्शन सिद्धांत और विचार का विकास विशुद्ध रूप से व्यवहारिक जीवन की दुश्वारियों कठिनाइयों और चुनौतियों से लडते जूझते हुए हुआ। शोषित, उत्पीडित तिरस्कृत और बहिष्कृत मानव जातियों के उद्धार और उत्थान के लिए महात्मा गांधी द्वारा किए गए संघर्ष की अनुभूतियो के फलस्वरूप गाँधी दर्शन, विचार और सिद्धांत का विकास हुआ। स्वाधीनता संग्राम के दौरान एक कर्मयोगी की तरह गांधी ने जिन अनुभूतियों का एहसास किया और  अभिव्यक्त किया वहीं गांधी दर्शन, गांधीवादी विचार और सिद्धांत बन गये। 

लेखक: मनोज कुमार सिंह प्रवक्ता 
बापू स्मारक इंटर काॅलेज दरगाह मऊ।

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