Breaking News

हिंदी सिनेमा पर दो दिवसीय राष्ट्रीय परिसंवाद कार्यक्रम रामानंद सरस्वती पुस्तकालय पर संपन्न।

आज़मगढ़।

बहादुर शाह जफर व हैदर की प्रस्तुति ।

बहुसंस्कृतिवाद वह प्रतिरोध का सिनेमा पर विद्वतजनों ने दीया व्याख्यान।

 सगड़ी।

सगड़ी तहसील क्षेत्र के रामानंद सरस्वती पुस्तकालय पर रजत जयंती वर्ष पर विविध कार्यक्रमों का आयोजन चल रहा है जिसमें हिंदी सिनेमा पर दो दिवसीय राष्ट्रीय परिसंवाद आयोजित हुआ ।

परिसंवाद कार्यक्रम में डॉक्यूमेंट्री फिल्म बहादुर शाह जफर की प्रस्तुति और सिनेमा हैदर की प्रस्तुति पर विद्वतजनों ने अपने-अपने विचार रखें इसके साथ ही राष्ट्र राज्य और अस्मिताओं का हिंदी सिनेमा , बहुसंस्कृतिवाद की सिनेमाई की छवियां और प्रतिरोध का सिनेमा पर विद्वानों ने अपने अपने विचार प्रस्तुत किए।

परिसंवाद कार्यक्रम में प्रोफ़ेसर सुरेश शर्मा ने अपने संबोधन में भारतीय सिनेमा की पहचान को परिभाषित करते हुए कहा कि मूक युग में ही भारतीय सिनेमा का स्वरूप तय हो गया था बाद के दिनों में उसका विकास हुआ दिखाई गई डॉक्यूमेंट्री बहादुर शाह जफर का उदाहरण देते हुए कहा कि भारत की में राष्ट्रीयता की पहचान जफर ने करा दी ।राष्ट्रीयता को भारतीय सिनेमा के माध्यम से सामने लाने की जरूरत है संप्रदायवाद प्रदेशवाद अलग-अलग इस राष्ट्रीयता की ही पहचान है सिनेमा को समाज को बदलने की बड़ी ताकत है एक सशक्त माध्यम है। वहीं चंद्र भूषण सिंह अंकुर ने अपने संबोधन में कहा कि प्रतिरोध का सिनेमा वस्तुतः जन संघर्षों पर बना सिनेमा है आदिवासी , दलित  संघर्षों , विस्थापन इत्यादि पर जल जंगल जमीन के लिए लड़ रहे लोगों के संघर्ष पर बन रहे  सिनेमा को दर्शकों तक पहुंचाने के लिए इस तरह के आयोजन देश के कई शहरों कस्बों में एक दशक से ज्यादा समय से किया जा रहा है आज के समय में प्रतिरोध का सिनेमा वास्तविक सिनेमा के रूप में लोगों के जीवन पर आधारित है। 

दो दिवसीय सिनेमा परिसंवाद कार्यक्रम में मनोज सिंह ने अपने संबोधन में कहा कि प्रतिरोध का सिनेमा जनता के वास्तविक जीवन के संघर्ष सुख -दुख , उल्लास का सिनेमा है ।सिनेमा लोगों के जीवन उसकी वास्तविकताओं को व्यक्त करने में असक्षम हो चुका है वस्तुतः दलित , आदिवासी , महिला , अल्पसंख्यक के सवालों पर हिंदी सिनेमा प्रयाय: चुप रहता है और उसको गलत तरीके से प्रस्तुत करता है भारत जैसे देश में प्रतिरोध सिनेमा बहुलवादी समाज जिनमें अनेक वर्गों संस्कृतियों परंपराओं अलग-अलग खानपान के लोग रहते हैं जिन्होंने सदियों में साथ रहते हुए सांस्कृतिक बहुलता स्थापित की है उन्होंने कहा कि संस्कृतिक बहुलता सामने लाने का काम ही प्रतिरोध सिनेमा का वास्तविक कार्य है।

प्रियदर्शन मालवीय ने अपने संबोधन में कहा कि कला और बाजारवाद का हिंदी सिनेमा में दांत लंबे समय से चल रहा है प्रतिरोध का सिनेमा समुंद्र में सिपी खोजने के बराबर है सिनेमा में प्रतिरोध का सिनेमा दो धारी तलवार है व्यावसायिकता और कला का द्वंद लंबे समय से चल रहा है उन्होंने कहा कि श्याम बेनेगल प्रतिरोध सिनेमा के पितामह कहे जाएंगे शोध व मेहनत के उपरांत प्रतिरोध सिनेमा स्थापित हुआ वास्तव सत्या , हथियार , रंग दे बसंती , चक दे इंडिया , तारे जमीन पर , दंगल , माय नेम इज खान , वेलकम टू संजरपुर कुछ सिनेमा लोगों के जीवन की समस्याओं पर आधारित अच्छी फिल्में।

हिंदी सिनेमा पर दो दिवसीय परिसंवाद कार्यक्रम पर स्वागत सुरेंद्र राठी  प्रलेस उत्तर प्रदेश ने किया अध्यक्षता विभूति नारायण राय और संचालन किरण सिंह ने किया इस अवसर पर मुख्य रुप से हिना देसाई , नारेंद्र  पुंडरीक , शेष नारायण राय , संजय जोशी ,  ममता कालिया प्रसिद्ध कथाकार , गोपेश्वर सिंह प्रसिद्ध आलोचक दिल्ली विश्वविद्यालय आदि लोग उपस्थित रहें।

रिपोर्ट: मनोज चतुर्वेदी

और नया पुराने