लेख।
पुस्तकों से ही भारत का भविष्य सुनहरा होगा
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12 अगस्त पुस्तकालय दिवस है। भारत की प्राचीन सभ्यता का हजारों साल का एक लम्बा इतिहास है, इस इतिहास को हमें नवीन पीठियों तक जानकारी के रूप में पहुँचाने में पुस्तकों की ही भूमिका है। भारत ऋषी परम्परा का देश है, ऋषियों की लेखनी से निकलने वाले भारतीय ग्रंथों का हमारे जीवन से सीधा-सीधा सम्बन्ध है।हजारों साल पहले रचित ये पुस्तकें ही हमें उनके ज्ञान को नई पीठियों से जोड़ रही है। ज्ञान की इस गंगा में हम मात्र इसलिये गोता लगाकर अभिसिंचित हो पा रहे हैं क्योंकि ये पुस्तकाकार रूप में हमारे पुस्तकालय में संरक्षित हैं।
भारत की साहित्यिक विरासत में रची गई जय शंकर प्रसाद कृत 'कामायनी 'की मनु और श्रद्धा जो सृस्टि के निर्माण के सूचक है यदि पुस्तक में दर्ज नही रहे होते तो ,हम तक अपना ज्ञान कैसे पहुँचा पाते?
भाषा समाज को एक दूसरे को आपस मे जोड़ती है और इसी भाषा को जब हम पुस्तक में प्रकाशित कर देते हैं तो यह व्यक्तिनिष्ठ न रहकर समाजनिष्ठ हो जाती है।
समाज के प्रत्येक युग की अपनी दृष्टि और सृष्टि होती है जो तात्कालिक होती है।बदलते परिवेश में जिस दृष्टि और सृष्टि की प्रासंगिकता शेष रह जाती है वह रचनाकार के माध्यम से दीर्घकालिक रहकर समाज मे चलता रहता है और वही ज्ञान पुस्तक के रूप में मानव का आगे मार्गदर्शन करता है।
अपने अपने नौनिहालों को पुस्तक से प्रेम करना सिखाना होगा।भारत सरकार और राज्य सरकारों को अच्छी पुस्तक छपवाने के लिये लेखकों को अनुदान देना होगा जिससे वे छप सके और पुस्तकालयों में रखी जा सके।पुस्तकालय को भी अतिरिक्त अनुदान देकर अच्छी पुस्तकें खरीदने का विकल्प खुले तौर पर देना होगा।आज भले ही ऑनलाइन का दौर है पर ऑनलाइन की दुनियां पुस्तकों की जगह नही ले सकती, पुस्तक को
पढ़ते-पढ़ते जब हम सीने पर रखकर सो जाते हैं और उनमें लिखी बातों में खो जाते हैं, वह एहसास सिर्फ एक पाठक ही व्यक्त कर सकता है। कभी -कभी पाठक निशब्द भी हो जाता है।जैसे आज भले ही मोबाइल में मैसेज का जमाना है पर एक दौर वो भी गुजरा है जब हम अपने लोगों से चिठ्टी-पत्री से बातचीत किया करते थे।हम अपनी भावनाएं जो दिल मे होती थी, उसे निकाल कर कागज पर लिखते थे,और अपने सगे और रिश्ते से जुड़े लोगों के चिठ्ठी का इंतजार महीनों किया करते थे।इन चिठ्ठियों की अपनी एक गोपनीयता भी होती थी।आज हर चीज सार्वजनिक हो रही है।मर्यादायें नही बच पा रही है, नैतिकता का पतन हो रहा है।भारतीय मूल्य जो हमारी थाती है वो सब छिन्न-भिन्न हो रहे हैं ,इसलिये बहुत सारी बातें गोपनीय रहने से समाज अच्छा बना रहने में सहायता करती है।
पुस्तकें किसी भी राष्ट्र के विकास की आधारशिला है ।ये राष्ट्र का भविष्य तय करती हैं और देश की सही रास्ते पर ले चलने में सहायक होती है।हमें पुस्तकालयों को हर हाल में संरक्षण देना होगा तभी राष्ट्र संरक्षित रहेगा।
डॉ0 अखिलेश चन्द्र
आजमगढ़