आज़मगढ़।
लेख। श्री गाँधी पीजी कॉलेज मालटारी के बी0 एड0 विभाग के पूर्व रीडर डॉ0 शालिग्राम शुक्ला 'नीर' जो एक सफल साहित्यकार भी थे का आज निधन हो गया।
शालिग्राम शुक्ल नीर जनपद ही नही राज्य और देश स्तर पर साहित्य में एक जाना-माना नाम थे। इनका जन्म 14 अगस्त 1939 को आजमगढ़ के मोहल्ला एलवल में हुआ था। इनके बड़े भाई डॉ0 राम प्रकाश शुक्ला 'निर्मोही' जो श्री दुर्गा जी पी जी कॉलेज चंडेश्वर,आजमगढ़ में बी0 एड0 विभाग में रीडर पद पर रहें उनका देहावसान पहले ही हो चुका है।
डॉ0 शालीग्राम शुक्ला के लिखे साहित्य से हिन्दी काफी समृद्ध हुई।उनके द्वारा किये गये कुछ साहित्य के काम निम्न हैं।
1.रक्त बांग्ला(1971)भारत -पाक युद्ध पर आधारित वीर काव्य जिस किताब की भूमिका तत्कालीन रक्षा मंत्री बाबू जगजीवन राम ने लिखी थी।
2.आधुनिक अवधि भोजपुरी इतिहास और काव्य
3.अंचरा (भोजपुरी गीत संग्रह)
4.हम दहेज न देब(भोजपुरी कहानी संग्रह
5.घरौंदा(बालगीत संग्रह)
6.डंक(व्यंग्य संग्रह)
7.आजमगढ़ का भूगोल
8.देवभूमि में दस दिन
9.जननी जन्म भूमिश्च
10.हम हैं हिन्दुस्तानी
इन्होंने स्नातकोत्तर हिन्दी में गोरखपुर विश्वविद्यालय से तथा पी-एच्0डी0 काशी विद्यापीठ वाराणसी से किया था। इनको भारत स्तर पर,राज्य स्तर पर तथा जनपद स्तर पर अनेकों सम्मान मिले जिससे आजमगढ़ का मान-सम्मान बहुत ऊंचा हुआ।
इनके लेख भारत के विभिन्न पत्र -पत्रिकाओं में प्रमुखता से छपते रहें।उन दिनों की कोई ऐसी लब्धप्रतिष्ठित पत्रिका नही शेष थी जिसमें न छपते रहें हों। आजमगढ़ में इन दो भाइयों की साहित्य की जोड़ी बड़ी मशहूर जोड़ियों में से एक थी।एक तरफ जहां निर्मोही जी कला और साहित्य पारखी भी थे वहीं नीर जी भी कला और साहित्य रथी थे।निर्मोही जी और नीर जी उस समय आपको सामने बैठाकर आपकी हूबहू पेंटिंग बनाने में भी दक्ष थे।
नीर जी का साहित्य आजकल,धर्मयुग,गगनांचल, योजना राष्ट्रधर्म जैसी पत्रिकाओं में सुर्खियां पाती रहीं।
महाविद्यालय के वो एक ऐसे साहित्यकार भी थे जो अपने समय मे सबसे अधिक छपते रहें और देश स्तर पर चर्चा में भी रहें।
नीर जी को अनेकों पुरस्कार भी मिले जिससे महाविद्यालय और जनपद का नाम रौशन हुआ ।इन पुरस्कारों में साहित्य महोपाध्याय,विद्या सागर,अन्तर जनपदीय सम्मान, सेवा सम्मान, सारस्वत सम्मान प्रमुख थे।
ये कला निष्णात भी थे इन्होंने फाइन आर्ट में उन दिनों इंदौर से कला में डिप्लोमा भी किया था।आपने साहित्यरत्न की भी उपाधि प्राप्त की थी।
आज उनके निधन से शिक्षा,साहित्य के साथ-साथ कला प्रेमी के लोग भी मर्माहत हैं, महाविद्यालय के समस्त परिवार के लोग भी शोकाकुल है।
लेख: डॉ अखिलेश चंद