कविता।
दो पैरों वाले ब्रह्माण्ड के इकलौते बुद्धिमान प्राणी ने,
अपनी बुद्धि से तरक्की के नए-नए कीर्तिमान स्थापित कर कर लिए,
अपने खोजी मस्तिष्क से बुलंदियों के अनगिनत आसमान छू लिए,
अपने ज्ञान अपनी मेधा के बल पर अनगिनत आविष्कार और चमत्कार कर लिए,
कल तक जो स्वप्न सरीखा लगता था,
जो महज हमारी कल्पनाओं के आकाश में तैरता था,
उसे अपनी प्रतिभा परिश्रम और पराक्रम से जमीन पर उतार दिया।
बस उसे असली पहचान दिलानी बाकी है,
उसे अभी इंसान होने का सबूत देना बाकी है।
अपनी भूख प्यास बुझाने के लिए,
जंगली जानवरों की तरह जंगल-जंगल भटकने वाला घुमक्कड़ मानव,
आज समुंद्र से आसमान तक नित नए-नए करतब दिखा रहा है,
चाँद पर कदम रख कर मंगल ग्रह पर जाने की तैयारी कर रहा है।
मरे जानवरों की खाल,या वृक्ष की छाल से तन ढकने वाला,
आज रैम्प पर चहल-कदमी करते हुए फैशन शो कर रहा है।
यह सच है कि इस शौकीन रंगमिजाजी मानव को
तरह के डिजाइनदार कपड़े बनाने का हुनर,
और पहनने का भरपूर सहूर आ गया,
यह अलग बात है कि- दौलत और शोहरत के नशे में,
उसे कपड़े पहन कर भी भरपूर नंगे होने का सहूर भी आ गया,
ताज्जुब होता है यह सब सोचकर , किसी तरह तन-बदन ढकने वाले असभ्य अशिक्षित मानव ने,
हर उत्सव हर कार्यक्रम हर अवसर और हर अंदाज़ के कपड़े बना डालें,
नहाने, तैरने, खाने, खाना-पकाने, टहलने और नाचने के लिए अलग-अलग परिधान बना डाले,
ये सारी कारीगरी उसकी उंगलियों की जादूगरी का सबूत है,
पर अभी भी एक कसक बाकी है,
उसे अभी इंसान होने का सबूत देना बाकी है ।
नदियों झीलों का पानी पीकर प्यास बुझाने वाले भोले भाले मानव ने,
उफनती नदियों पर बांध बना दिए और खेत खलिहान की प्यास बुझा रहा है,
कौन जानता था धरती के नीचे खजाना है?
अपने तकनीकी कौशल से धरती का हर खजाना खोज डाला,
उसे गलाया पिघलाया और तरक्की के अगणित औजार बना डाला,
गुफाओं और कन्दराओं में रात गुजारने वाले इस आदर्श बर्बर ने,
अजन्ता एलोरा की गुफाओं से लेकर नक्काशीदार इमारतें भवन बना लिए,
सफेद संगमरमर को तराश कर मुहब्बत की इमारत तामीर कर लिया,
खुद की आंखे चौंधिया जातीं हैं खुद की नक्काशी और वास्तुशिल्प पर,
यह नक्काशी, यह वास्तुशास्त्र, यह वास्तुशिल्प और यह वास्तु सौन्दर्य,
उसके हाथों के अन्दर छिपे अद्वितीय रचनाधर्मिता का सबूत है,
पर आज भी उसकी असली झलक बाकी है ,
इस चमत्कारी इंसान को इंसान होने का सबूत देना बाकी है।
क्योंकि- नदियों में तैरती लाशें, श्मशानो में जलती ज़िन्दगियाँ,
और कब्रिस्तानो मे दफन होती जिंदगियाॅ,
मरती संवेदनाएं निष्ठुरता की पराकाष्ठा पर पहुंचते रिश्ते,
खुद को मारने के लिए नये नये अनगिनत औजार ,
प्रश्नचिन्ह खडा करती हैं हमारे इंसान होने के अस्तित्व पर,
इस बसुन्धरा के सबसे प्रज्ञावान ने जरूर असंभव को संभव कर डाला,
पर इस दौर में उसे इंसान होने का सबूत देना बाकी है ।।
लेखक: मनोज कुमार सिंह प्रवक्ता