आज़मगढ़।
कविता
हम लडेंगे हर उदास,ऊचाॅट ,मनहूस और मुर्दापरस्त मौसम के खिलाफ,
अपने हसीन रंगीन ख़्वाबों, ख़्वाहिशों, और हर सुनहरे सपनों के लिए।
एक-एक कतरे उजालों और अपनी सूरमयी, सुहावनी और सिन्दूरी सुबहों के लिए।
हम लडेंगे हर नफरती, बदबूॅदार , जहरीली और बाजारू हवाओं के खिलाफ,
अपनी चकहती , महकती पुरवैया और अपनी अल्हड़ बंसती बयारो के लिए।
हम लडेंगे अपनी हर बदनसीबीं, बदकिस्मती ,बर्बांदी और बदहाली के खिलाफ,
अपनी मुक्कम्ल बहबूदी, बुलंदी, बेहतरी और अपने बगीचे की मदमस्त बहारों के लिए।
हम लडेंगे नाजुक इंसानी रिश्तों को लहू-लुहान करने वाली तलवारो , खंजर और कटारों के खिलाफ,
अपनी आपसदारी की रवायतों और प्यार मुहब्बत के रश्मो-रिवाजों के लिए।
हम लडेंगे लाल मखमली कालीनों , गूंगी-बहरी सत्ता के नशे में चूर चौखटो के खिलाफ ,
आखिरी कतार में खड़े बेवस, लाचार आदमी की चिखो-चीत्कारों की गरजती इंकबाली गूंजो के लिए।
लेखक: मनोज कुमार सिंह प्रवक्ता