लेख।
क्रांतिकारी जय बहादुर सिंह के निधन पर श्रीमती इन्दिरा गाँधी ने कहा था कि- पूर्वांचल का शेर दुनिया से चला गया!
अपनी चौखट से जमींदारी के खिलाफ बगावत किया था क्रांतिकारी जयबहादुर सिंह ने---
लेख: मऊ जनपद के सूरज पुर गाॅव के जमींदार नरसिंह नारायण सिंह के तीसरे पुत्र जयबहादुर सिंह आजादी के संघर्ष में अपने साहसिक कारनामों और समानता और न्याय पर आधारित समाज बनाने के लिए अपने क्रांतिकारी कार्यों और तेवर के लिए भारतीय इतिहास में सूरज की तरह चमकते रहेंगे। साहित्य, अदब और क्रांतिकारी चेतना के लिए उर्वरा भूमि तथा सरयू और घाघरा के दोआब में बसे सूरजपुर गाॅव में 20 जनवरी 1909 मे पैदा हुए जयबहादुर सिंह बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि, मेधावी, इंसाफ पसंद और संघर्षशील स्वभाव के थे। आरम्भिक शिक्षा अपने गांव पर ही पूरी करने के उपरांत उच्च शिक्षा के लिए काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की तरफ कूच किया। बनारस में मदनमोहन मालवीय की अगुवाई में छूआ-छूत जैसी घिनौनी प्रथा को मिटाने तथा जातिगत वैमनस्यता को दूर करने में श्लाघनीय प्रयास किया। भारतीय सभ्यता-संस्कृति के मस्तक पर कलंक के रूप कुख्यात छुआ-छूत जैसी अमानवीय प्रथा को मिटाने तथा शोषितो, वंचितों और हाशिए पर खड़े लोगों के लिए संघर्ष करने का बीजांकुर इसी दौरान जयबहादुर सिंह के हृदय में प्रस्फुटित हुआ। महात्मा गांधी द्वारा चलाए जा रहे असहयोग आंदोलन के स्थगित होने के बाद शहीद-ए-आज़म भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव और चन्द्रशेखर आज़ाद के नेतृत्व में हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन ने ब्रिटिश साम्राज्य के विरुद्ध प्रतिरोध और संघर्ष की मशाल जलाए रखी। बीसवीं शताब्दी के तीसरे दशक में जवानी की दहलीज पर कदम रख चुके जयबहादुर सिंह हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन की क्रांतिकारी गतिविधियों में अभिरुचि लेने लगे और नौजवानों के आदर्श बनते जा रहे भगत सिंह और उनकी मंडली के विचारों, आदर्शों और सिद्धांतों के प्रति आकर्षित होने लगे। 23 मार्च 1931 को भगतसिंह, राजगुरु और सुखदेव को फांसी दिये जाने की घटना और 27 जुलाई 1931 को चन्द्रशेखर आज़ाद की स्वयं की पिस्तौल से हूई स्वाभिमानी मौत की घटना ने जयबहादुर सिंह को झकझोर कर रख दिया और उनके अन्दर अंकुरित हो रही क्रांतिकारी चेतना का प्रखर कर दिया। इन घटनाओं से गहरे रूप से प्रभावित जयबहादुर सिंह तन मन और धन से क्रांतिकारी बन गये और बनारस छोड़ कर इलाहाबाद चले। उस समय इलाहाबाद क्रांतिकारी गतिविधियों का सर्वाधिक सक्रिय केन्द्र हुआ करता था। क्रांतिकारी जयबहादुर सिंह के मन मस्तिष्क में क्रांति की ज्वाला इस कदर प्रखर और हूई कि- उन्होंने 1936 मे अपने खून से प्रतिज्ञा पत्र लिखकर कहा हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन की सदस्यता ग्रहण की। उस अमिला में एक जमींदार और रसूखदार घराने में पैदा हुए बाबू झारखण्डेय राय हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन के बडे नेताओं में शुमार किए जाते थे। पास- पडोस का होने के नाते जयबहादुर सिंह को झारखण्डेय राय का सानिध्य और मार्गदर्शन मिलता रहा। हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन के क्रांतिकारी गांधी जी से इतर आक्रामक तौर-तरीकों से अंग्रेजी हुकूमत से लडने-जूझने में विश्वास करते थे। क्रांतिकारी गतिविधियों को व्यापक रूप से संचालित करने के लिए काफी मात्रा में धन की आवश्यकता पडती थी। इस आवश्यकता की पूर्ति के लिए क्रांतिकारी रेलवे द्वारा लाये जा रहे खजाने को लूटने जैसा साहसिक कारनामा करते रहते थे। 9 अगस्त 1925 को सुप्रसिद्ध काकोरी डकैती कांड की तर्ज पर जयबहादुर सिंह ने भी 1936 मे झारखंडेय राय, मुक्तिनाथ उपाध्याय , कृष्णा नन्द राय और जामिल अली के साथ मिलकर पिपरीडीह दुल्हपुर में खजाने से भरी ट्रेन को लूटने का साहसिक कार्य किया। इस चर्चित कांड के बाद अन्य साथी गिरफ्तार हो गये परन्तु जयबहादुर पुलिस की पकड़ में नहीं आए। कुछ महीने गुमनाम जिन्दगी जीने के बाद अंततः जयबहादुर सिंह गिरफ्तार हो गये। इस कांड में चले मुकदमे में जयबहादुर सिंह को लगभग दस साल तक सजा हूई। दस साल सजा काटने के बाद 1946 मे सीधे भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के दफ्तर पर पहुंचे और किसानों, मजदूरों और मेहनतकश के पक्ष में आजीवन संघर्ष करने का संकल्प लिया। अपने क्रांतिकारी व्यक्तित्व और ओजस्वी वाणी से पूरे पूर्वांचल को क्रांतिकारी रंग में रंग दिया। 9 मई 1946 को जयबहादुर सिंह ने लगभग चालीस हजार किसानों, मजदूरों, बुनकरों और नौजवानों को साथ लेकर आजमगढ़ स्थित तत्कालीन अंग्रेज कलेक्टर का जबर्दस्त घेराव किया। इस घेराव की सूचना अंग्रेज कलेक्टर ने लंदन स्थित अपनी सरकार के शीर्षस्थ संचालकों को भी दिया। इस घेराव की चर्चा ब्रिटिश संसद में भी हूई कि- एक सामान्य आदम कद का नेता हजारों लोगों के साथ जिला मुख्यालय का घेराव करते लगभग छ घंटे से लगातार भाषण दे रहा है और जनता हटने को तैयार नहीं हैं।
समाजवादी विचारधारा से अनुप्राणित होकर जयबहादुर किसानों मजदूरों और मेहनतकश के पक्ष में आजीवन संघर्ष करते रहे। समाजवाद का असर जयबहादुर सिंह पर इतना गहरा पडा कि-अपने बाॅप दादा की पुश्तैनी जमीन किसानों और खेतिहर मजदूरो में बाँट दिया। समाजवाद के बुनियादी सिद्धांत "जो जमीन पर हल चलायेगा वही जमीन का मालिक होगा " को अपनी जमीन का किसानों और खेतिहर मजदूरो में बंटवारा कर ईमानदारी से जमीन पर उतारने का प्रयास किया। इस घटना ने जयबहादुर सिंह को किसानों खेतिहर मजदूरो का मसीहा बना दिया। जयबहादुर सिंह 1958 मे आजमगढ़- बलिया स्थानीय निकाय के विधान परिषद् चुनाव में विधान परिषद् सदस्य चुने गये फिर 1962 मे जयबहादुर सिंह घोसी लोकसभा से सांसद चुने गए। हिन्दी और ऊर्दू दोनों भाषाओं का जन्म भारत में हुआ और 1857 से लेकर 1947 तक चले स्वाधीनता संग्राम के दौरान हिन्दी ऊर्दू दोनों भाषाऐ आजादी के संघर्ष की भाषा के साथ-साथ सहकार, समन्वय और साहचर्य की भाषा बनी रही। इसलिए क्रांतिकारी जयबहादुर ऊर्दू को भाषाई सम्मान दिलाना चाहते थे। इसलिए सांसद रहते हुए उन्होंने ऊर्दू को दूसरी राजभाषा का दर्जा देने के लिए लखनऊ विधानसभा के सामने धरना दिया। जयबहादुर सिंह के जीवंत संघर्ष के कारण ऊर्दू को दूसरी राजभाषा का दर्जा दिया गया। इस आन्दोलन के दौरान हृदय गति रूक जाने उनका निधन हो गया। इस ऐतिहासिक कुर्बानी ने जयबहादुर सिंह को शहीद-ए-ऊर्दू बना दिया। ऊर्दू अदब के लोग आज भी शहीद-ए-ऊर्दू को सम्मान से याद करते हैं। जयबहादुर सिंह के निधन पर श्रीमती इन्दिरा गाँधी ने कहा था कि पूर्वांचल का शेर दुनिया से चला गया। शहीद-ए-ऊर्दू जयबहादुर सिंह जनता के बुनियादी मुद्दों पर सडक पर निरंतर संघर्ष करते रहे। जयबहादुर सिंह पूरे पूर्वांचल में सडक से लेकर सदन तक संघर्ष करने वाले लडाकू नेता के रूप में आज भी आदर से याद किए जाते हैं।
लेखक: मनोज कुमार सिंह प्रवक्ता