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तवे की रोटियां (गज़ल)

गजल।
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न जाने क्या-क्या सितम   सहने को
मजबूर कर देती हैं तवे   की रोटियां

माँ को बेटे से और  बेटे को   माँ से 
बहुत दूर कर देती हैं तवे की रोटियां

रिक्शा तांगा ठेला ऑटो छीनी -हथौड़ी
क्या-क्या चलवा देती हैं तवे की रोटियां

घर-आँगन में छम-छम बेटी के पायल की   घुघरुं
माँ-बाप के कान से दूर कर देती हैं तवे की रोटियां

माँ ने कहा था बेटे से घर से काम पर    निकलते वक्त
भूख लगे तो खा लेना मेरे हाथ की बनी तवे की रोटियां

माँ तो अब नहीं रहीं भूख भी खुलकर अब लगती नहीं
न जाने क्या-क्या मिलाकर माँ बनाती थी तवे की रोटियां

खेत की सिंचाई पैर की विवाई     डॉक्टर की दवाई
जब खाने की याद आयी तब याद आई तवे की रोटियां

जब छा गया रग्घू की मड़ई पर उसके छप्पर का  छत
मिल बैठ सबने तभी एक साथ खाई थी तवे की रोटियां

सरसों का साग माँ के हाथ की चूल्हे के मक्के की रोटी
अब सिर्फ यादों में ही बस गयी है वो  तवे की रोटियां

क्या बनायें धनियां और क्या-क्या अरमान रखें  तवे पर
गैस हुई अब इतनी महंगी कैसे सिके अब तवे की रोटियां

कौन सुनेगा किसको सुनाएं और क्या-क्या सितम बताएं
किस तरह से मुँह तक पककर पहुँचती हैं तवे की रोटियां

खाना जब नहीं मिला कई दिन तब रोकर कहा था मंगरु
गाँव से शहर तेरी खातिर तो आया था ये तवे की रोटियां

लेखक: डॉ0 अखिलेश चन्द्र
   आजमगढ़

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