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लेख: उपभोक्तावाद से मुक्ति

लेख।

विचार- मनोज कुमार सिंह प्रवक्ता 
बापू स्मारक इंटर कॉलेज दरगाह

लेख: हो सकता है कि एक व्यक्ति उपभोग करते हुए भी उपभोक्तावादी न हो।इसी के विपरीत एक व्यक्ति उपभोक्तावादी हो सकता है लेकिन उपभोग कर ही न पाता हो। इसका मतलब हुआ कि हमें उपभोग और उपभोक्तावाद में अन्तर करना चाहिए।
                    जीवन की कमतर आवश्यकताएं पूरी करते हुए भी हम उपभोग तो करते ही हैं। जीवन का अस्तित्व बचाए रखने के लिए उपभोग आवश्यक है। ऐसे में उपभोग करने वाला कैसे और कब उपभोक्तावाद का शिकार हो जाता है?
           उपभोक्तावाद का स्रोत है लालच,हवस,उन चीजों के पीछे भागना जिनकी व्यक्ति को वास्तव में आवश्यकता भी न हो। इसलिए हम उपभोक्तावाद को विलासिता से जोड़ सकते हैं। इस अर्थ में शरीर की मूलभूत आवश्यकताओं से आगे बढ़ कर उत्तरोत्तर और अधिकाधिक सुख पाने में लिप्त होते जाते हैं तो हम उपभोक्तावादी होते जाते हैं।
                     आज उपभोक्तावाद एक प्रकार का रोग बनता जा रहा है, क्योंकि अब वह भी उपभोक्तावादी बनता जा रहा है जो अपनी मूलभूत आवश्यकताएं भी पूरी नहीं कर पा रहा है। उदाहरण के लिए गरीब आदमी पौष्टिक भोजन कर पाए या न, वह मंजन और शैंपू का इस्तेमाल करने की आदत में फॅंसता जा रहा है। यह एकदम आधुनिक रोग है और मुख्यरूप से पूॅंजीवाद के विस्तार के साथ बढ़ता जा रहा है।
                   इसकी पकड़ इतनी मजबूत हो गई है कि व्यक्ति कितना बड़ा उपभोक्ता है इसी से उसकी हैसियत का पता चलता है। इतिहास में मनुष्य का पहला अस्तित्व "इंसान "के रूप में था। फिर फ्रांसीसी क्रांति के बाद उसके अधिकारों की बात करके उसे 'नागरिक 'कहा जाने लगा। नागरिक का दर्जा इंसान से भी बड़ा बना दिया गया। फिर आयी बाजार की ऑंधी और अब तो उपभोक्ता नागरिक और इंसान से भी बड़ा बना दिया गया है। इस उलट - पुलट में इंसान बेचारा होता गया है,न केवल सामान्य इंसान, बल्कि उपभोक्ता के अन्दर का भी इंसान।
           पूॅंजीवाद में जितना सफल कौशल और किसी क्षेत्र में नहीं दिखाया।साइंस और टेक्नोलॉजी के रूप में पूॅंजीवाद को ब्रह्मास्त्र मिल गया। इसकी मदद से वह तरह- तरह के सूक्ष्म और कारगर हथियार बना कर अपनी राह की रूकावटों को दूर करता जा रहा है।आप जानते ही होंगे कि पूॅंजीवाद ने सोवियत यूनियन को हथियारों से नहीं हराया। उसने धीरे -धीरे समाजवाद के संचालकों को उपभोक्तावादी बनाया। कम्युनिस्ट पार्टी के नेताओं के लिए अलग दुकान खुलने लगी। सोवियत नागरिक मामूली जरुरतों के लिए भी लाइन में लगने को मजबूर था और नेता आसानी से विलासिता के विदेशी माल खरीद पाते थे। क्रांति से जन्मा स्वाभिमान और सामाजिक सरोकार जर्जर होते गए। लेने की क्षमता छीनती जा रही परम्परा से कहा जाता था, 'राम नाम की लूट है, लूट सके तो लूट 'अब तो राम भी बाजार में खड़े हैं और कहा जा सकता है माल-माल की लूट है।
                उपभोक्तावाद का सबसे बड़ा वाहक विज्ञापन हो गया है। पारम्परिक कहावत है कि 'आवश्यकता आविष्कार की जननी है' अब निरर्थक होती जा रही है।अब तो आविष्कार कर लिया जाता है फिर तरह - तरह के प्रचार के माध्यम से व्यक्ति को बता दिया जाता है कि उसे उस आविष्कृत वस्तु की आवश्यकता है।जब यह बताने का काम दुनिया की सबसे आकर्षक और मोहक  नारी कर रही हो तो भला कैसे कोई टिक पाये --ब्रहा और विश्वामित्र देवता और ऋषि नहीं टिक पाये तो बेचारा इंसान कैसे टिक पायेगा? विज्ञापन नारी के आकर्षक शरीर का ही इस्तेमाल नहीं करता वह तरह -तरह के प्रलोभन फेंकता रहता है। एक ख़रीदो दो ले जाओ --कभी- कभी तो तीन, बाजारों में लगातार लगी हुई सेल, किस्तों में खरीदने की सुविधा, बैंकों द्वारा उपभोक्ता सामग्री खरीदने के लिए ऋण, त्यौहारों का बाजारीकरण,तरह-तरह के दिवस,जिन पर उपहार लेने -देने की मजबूरी ---ये सब उपभोक्तावाद के कारगर हथकंडे हैं। जहां विद्यालय और अस्पताल नहीं हैं वहाॅं भी कोका कोला,पाउच में तम्बाकू,पान- मसाला , शैंपू, कुरकुरे और चिप्स उपलब्ध है। ग्रामीण बाजार के बढ़ने का प्रतिशत तेजी से बढ़ रहा है।
              उपभोक्तावाद मनुष्य को मानसिक रोगी बनाता जा रहा है।अब युवा प्रेम से अधिक मोटरसाइकिल के सपने देखने लगा है, सम्बन्धों पर उपभोक्ता सामग्री भारी पड़ती जा रही है। उपभोक्तावाद ने धर्म, न्याय, साहित्य - कला, विज्ञान यानी सबकुछ को माल बना दिया है और इसीलिए कस्बों तक में माल खुलते जा रहे हैं।लोग मन्दिर से अधिक माल जाने लगें हैं।
  ‌‌लाल बहादुर वर्मा की पुस्तक "आजादी का मतलब क्या"से साभार।

  क्रमशः जारी...........

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