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गोवंश पर लंपी का प्रहार, नही हो रहा उपचार, कौन हैं जिम्मेदार।

उत्तर प्रदेश।

लेख: जरा सुनो हमको मां की उपाधि देने वालों कल तक पूजे जाने वाली गौ  वंशज हूं। मैं देखते ही देखते आज के राजनीति का मोहरा बन गई। कहने को तो हर कोई राजनीति से ताल्लुक रखने वाला गौसेवक ही है, लेकिन आज गोवंश  जिंदगी और मौत की लड़ाई लड़ रही हैं। जहां वास्तव में समाजसेवी व राजनेताओं की गोवंश को आवश्यकता है, वहां उन्हें मदद मिल ही नहीं रही। बल्कि गोवंश केवल राजनीति का मोहरा बनकर सिमटता जा रहा है।
आपको बात दे कि लंपी वायरस से भारत के कई राज्य के पशुपालक दहशत में हैं. राजस्थान में यह वायरस कहर बनकर टूटा है. राज्य सरकार के मुताबिक, यहां 2100 से ज्यादा गायों की इस वायरस की वजह से मौत हो चुकी है. वहीं, 4 लाख से ज्यादा मवेशी इस वायरस से संक्रमित बताए जा रहे हैं. हरियाणा में भी संक्रमित गायों की संख्या 50 हजार के पार कर चुकी हैं. यहां के कई जिलों में रोजाना सैकड़ों गायों की मौत दर्ज की जा रही है. गुजरात के 14 जिलों में ये बीमारी कहर बनकर टूट रही है. वहीं पंजाब और मध्य प्रदेश में इस वायरस की काफी मार पड़ी है. सरकार ने फिलहाल, इस रोग से संक्रमित गायों को गोट पॉक्स वैक्सीन लगाने की सलाह दी है.वही लंपी वायरस ने अब उत्तर प्रदेश के गांवों में कहर बरपाना शुरू कर दिया है. फिलहाल, राज्य में इससे जुड़े 15,000 केस रिकॉर्ड किए जा चुके हैं.  1414 गांव तक इस वायरस का कहर है.रोकथाम के लिए टीम- बनाई है. यह टीम इस बीमारी को रोकने के लिए अभियान चला रही है।
फिलहाल, ये संक्रमण राज्य के 21 जनपद अलीगढ़, अमरोहा, बागपत, बिजनौर, बदायूं. बुलंदशहर, एटा गौतम बुद्ध नगर, गाजियाबाद, हापुड़, हाथरस, मथुरा, मेरठ, मुरादाबाद, मुजफ्फरनगर, सहारनपुर, संभल, शाहजहांपुर, शामली, फिरोजाबाद, और बरेली में काफी तेजी से फैल रहा है. अब तक में 115  गायों की मौत हो चुकी है. मृत्युदर  0.79 दर्ज किया गया है. पशु पैठ, मेले और पशुओं के आवागमन पर भी प्रतिबंध लगा दिया गया है. हालांकि अभी भी सरकार द्वारा कोई विशेष महत्वपूर्ण कदम इस रोग के जड़ से विनाश के लिए नहीं उठाया गया है। आज भी गौ वंश अपने जीवन के लिए संघर्ष कर रहा है।आजकल गाय या यूं कहें कि संपूर्ण गोवंश की दुर्दशा हर संवेदनशील व्यक्ति को व्यथित कर जाती है। दूध न देने वाली गउएं, बेवश बछड़े व बैल भूखे-प्यासे सड़कों पर भटकने हेतु मजबूर हैं। चारा तो दूर की बात, कोई पानी तक भी इन बेसहारा जीवों को नहीं पिलाता। ये बेवश बेसहारा जानवर कहां जाएं?

लेखक: गौरव सिंह राठौर

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