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श्री रामानंद सरस्वती पुस्तकालय पर चलाया गया आजीविका उद्यम विकास कार्यक्रम।


आज़मगढ़।

रिपोर्ट: वीर सिंह

आजमगढ़। सगड़ी तहसील क्षेत्र के जोकहरा गांव में स्थित श्री रामानंद सरस्वती पुस्तकालय विगत तीन दशकों से महिलाओं को सशक्त एवं आत्मनिर्भर बनाने का कार्य कर रहा है |
 इसी क्रम में संस्था द्वारा नाबार्ड के सहयोग से रियुसेबल सेनेटरी पैड निर्माण की इकाई को स्थापित करने हेतु आजीविका उद्यम विकास कार्यक्रम चलाया जा रहा है | समूह की महिलाओं की सहभागिता के साथ सेनेटरी पैड निर्माण की इकाई को स्थापित करने के लिए चलाए जा रहे इस प्रशिक्षण कार्यक्रम का विधिवत उद्घाटन संवाद संस्था की डायरेक्टर शीतल तलवार ने पुस्तकालय सभागार में किया | 
इस अवसर पर बोलते हुए नाबार्ड के जिला विकास प्रबंधक आरिफ खान ने बताया कि ग्रामीण महिलाओं को रोजगार से जोड़ने के लिए चलाए जा रहा यह प्रशिक्षण पूरा हो जाने पर बार-बार इस्तेमाल किए जा सकने वाले इस सेनेटरी पैड का उत्पादन व विपणन महिलाओं के द्वारा किया जाएगा | उन्होंने कहा कि रियुसेबल सेनेटरी पैड आज समय की जरुरत है | उन्होंने उम्मीद जाहिर की कि जल्दी ही हम इस पैड की ऑनलाइन मार्केटिंग करेंगे | यह पैड निर्माण करने वाली महिलाओं और इसका इस्तेमाल करने वाली महिलाओं के जीवन में बड़ा परिवर्तन लायेगा | इस अभियान से हमें यूनाइटेड नेशन द्वारा बनाये गये स्वास्थ लक्ष्यों को हासिल करने में मदद मिलेगी | उन्होंने जोर देते हुए कहा की हमें मासिक धर्म से जुड़े मिथकों को तोड़ कर बेहतर स्वास्थ के लिए विशेषज्ञों द्वारा सुझाई गई गाइड लाइन का पालन करना चाहिए | 
संस्था की निदेशक हिना देसाई ने कहा कि हमारे समाज में मासिक धर्म को लेकर कई गलत धारणाएं हैं |
हम इस पर खुलकर बात नहीं करते | इसे छुपाया जाता है, एसा दिखाया जाता है की इसका अस्तित्व ही नहीं है | इस कारण से महिलाएं एक मानसिक बोझ के साथ जीती हैं | कुछ मान्यताएं यह भी कहती हैं कि इससे महिलाएं अशुद्ध हो जाती हैं जबकि यह सही नहीं है | मासिक धर्म एकदम प्राकृतिक है और संतान की उत्पत्ति का अभिन्न अंग है लेकिन देखा गया है कि हमारे समाज में बहुत से पुरुष और महिलाएं मासिक धर्म के बारे में अनभिज्ञ रहते हैं और इस पर बातचीत करने से हिचकते हैं | इसे छुपाने की प्रवृत्ति और जानकारी के अभाव के कारण महिलाएं इस दौरान आवश्यक स्वच्छता नहीं रख पाती जिसकी वजह से उन्हें कई तरह की बीमारियां भी हो जाने का खतरा रहता है | हिना देसाई ने बताया कि विषय का एक महत्वपूर्ण पहलू सेनेटरी पैड भी है | वर्तमान में प्रयोग किए जा रहे अधिकांश सेनेटरी पैड यूज़ एंड थ्रो वाले हैं जिनसे महिलाओं पर आर्थिक बोझ पड़ता है और यह हमारे पर्यावरण को भी नुकसान पहुंचा रहे हैं | प्रशिक्षण के उपरांत महिलाएं पुनः इस्तेमाल किया जा सकने वाला कॉटन के सेनेटरी पैड का उत्पादन, पैकेजिंग एवं मार्केटिंग स्वयं करेंगी और आत्मनिर्भरता की ओर कदम बढ़ाएंगी |
इस प्रशिक्षण को देने के लिए दिल्ली से राष्ट्रीय फैशन टेक्नोलॉजी संस्थान निफ्ट से उपाधि प्राप्त और इस क्षेत्र में लम्बा अनुभव रखने वाली शीतल पुरी पुस्तकालय पर आई हैं | वह महिलाओं को सैनिटरी पैड को कुशलता से बनाने के गुर सिखाएंगी | पैड के उत्पादन, प्रबंधन और मासिक धर्म से जुड़े स्वास्थ्य विषयों तथा स्वच्छता के मुद्दे पर जानकारी अंतरराष्ट्रीय संगठनों के साथ काम कर रहे वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता संजीव जैन देंगे | महिला स्वास्थ्य से जुड़े इस गंभीर विषय को वह कॉलेज की छात्राओं से भी साझा करेंगे | संजीव जैन ने बताया कि कपड़े से बने पैड का प्रयोग करके महिलाएं हानिकारक रसायन, कृत्रिम सुगंध और प्लास्टिक से बच सकते हैं इसके अलावा यह चयन पर्यावरण के लिए भी बहुत अच्छा है | जो भी पैड इस्तेमाल के बाद फेंका जाता है वह कूड़े के रूप में जलाया जाता है जिससे हानिकारक गैस पर्यावरण में जाकर उसे दूषित करती हैं |
इस अवसर पर बने बनाए जा रहे सेनेटरी पैड को नाम देने के लिए एक प्रतियोगिता का आयोजन हुआ | बुद्ध स्वयं सहायता समूह की महिलाओं द्वारा दिए गये नाम “सक्षम” को सबसे अच्छा पाया गया | नाबार्ड के डी डी एम महोदय ने बुद्ध स्वयं सहायता समूह की महिलाओं को इस जीत पर सम्मानित किया |  इस अवसर पर मैनेजमेंट कॉलेज के पूर्व रजिस्ट्रार तेज प्रताप सिंह, प्रभावती, नीतू, मीरा, चंद्रकला, सीमा, नेहा, गंगा, सुमन, वैजयंती, शीला, रीता आदि उपस्थित रहे |

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