विचार।
Dr. Tapan Pandey
Article Writer
नई साल की शुभारम्भ बस्- कुछ ही दिनो में होने वाला है। प्रश्न ये नही कि- मुझे और आप सभी को नई साल की ढेर सारी शुभकामनाएं मिलेंगे और जिसे जितना अधिक मिलेंगे, वह अपने को अधिक गौरवाम्बित अनुभव करेंगे। कुछ ऐसे मौलिक मनुष्य भी समाज मे जीवित है, जिसके कंधो पर समाज की "जीवन धुरी" निरंतर गड़ गड़ रगड़ खा रही है, जिसकी कर्कश ध्वनि हमारे लक्जरी कारों के धुंआ में दब जाती है और अधिकतर मनुष्यो को सुनाई नही पड़ती। जिन सर्वहारा चिरवस्त्र धरियो को इस कंप कंपाती शीत की हिमेल हवा से थर थर कंपा रहे है, उन के लिए नई साल का शुभागमन निश्चित ही कष्टकर अभिशाप से कम नही है। क्या- उन्हें भी नई साल की शुभकामनाएं चाहिए अथवा तन ढकने के लिए "आपके घरमे सालो से धूल चाट रही कई कई जीर्ण शीर्ण मैल वस्त्र, जिसे आप केवल मोह वश: और कृपणता के कारण किसी को दान करना भी उचित नही समझते, केवल उन्हीं वस्त्र में से एक आध टुकड़ा चाहिए" ?
गरीबी और गरीबो का कोई भगवान नही होता। उसकी करुण क्रंदन का आर्तनाद तो भगवान भी नही सुनता। जब मंदिर, मस्जिद और गिरजा घरो में आप हम एक एक उच्च कोटि के व्यक्ति भिखारी बन कर भगवान के सामने कुछ पाने के निमित्व, कातर स्वर से रो रो कर हाथ फैलाकर भीख मांगते है, उस समय भगवान से निराश हुए कुछ निन्म कोटि के भिखारियों ने हम उच्च कोटि के भिखारियों के सामने हाथ फैला रो रो कर, रोटी और कपड़े के लिए भीख मांगते है।
सरकारी सहायता "उचित समय" पर प्राप्त होगा, इस पर पूर्ण भरसा न करे, वो तो उस समय जरुरतमंदो को प्राप्त होता है-- जब उन जरूरत मंद गरीब भिखारियोंका आधी आबादी प्रबल शीत के थपेडों से धरती छोड़ कर स्वर्ग सिधार जाते है और बाकी आधी गरीब जिन्होंने शीत के थपेड़ों से लड़ते हुए किसी प्रकार मार्च के माह में प्रवेश कर जाते है।
आइये- अभी दान करने के उचित समय को पहचाने और एक हाथ आप बढ़ाये, एक हाथ मै भी। उन निःसहाय दरिद्रो नारायणों पर हम भी थोड़ा दया करे, जिन के देह पर जीर्ण शीर्ण वस्त्र का लोथड़ा और हाथों में जर्जर थाली लेकर शहर शहर और गांव गांव की गली गली में भटक रही है।
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समाचार इंडिया लाइव
ब्यूरो आज़मगढ़