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कथा सम्राट मुंशी प्रेमचन्द की लिखी कहानी 'पूस की रात'की समीक्षा।

लेख, समीक्षा। 

आज कथा सम्राट मुंशी प्रेमचन्द की लिखी कहानी "पूस की रात"का अध्ययन करने का सुअवसर निकाला।कहानी एक किसान परिवार हल्कू-मुन्नी और उनके पालतू कुत्ता जबरा की दास्तान कारुणिक तरीके से गरीबी के दंश को मार्मिकता के साथ आगे बढाती है।किसान के लिये कर्ज कितना अहितकर होता है यह भी इस कहानी के माध्यम से कहानीकार ने बताकर लोगों को कभी कर्ज न लेने की हिदायत भी दी है।हल्कू द्वारा सहना से लिया गया कर्ज ही इस कहानी का असली दर्द है।पूस की रात के ठण्ड को ध्यान में रखते हुए हल्कू ने तीन रूपये बचा कर रखे थे कि इसी पैसे से कम्मल खरीदेगा और खेत की रखवाली उसे ओढ़कर करेगा।हल्कू होनी से अंजान है जैसे सभी मानव होते हैं।आदमी जो सोचे और वही हो तब तो जीवन में संकट ही न रहे।
मात्र तीन रूपये का लेना-देना वो भी सामान्य आदान-प्रदान में हो जाये तो सब ठीक हो जाय, पर यहाँ तो आदान-प्रदान कम गाली-गलौच ज्यादा है।गाली किसी रईस को कोई दे तो दर्द शायद कम हो पर एक किसान को जो भारत का अन्नदाता है जिससे भारत अपना पेट भरता है इसलिये सभी को अखर जाता है।कहानी हल्कू के द्वारा अपनी पत्नी मुन्नी को दिए गए स्टेटमेंट से शुरू होती है-'सहना आया है, लाओ,जो रूपये रखे हैं, उसे दे दूँ,किसी तरह गला तो छूटे।'
हल्कू की बात को सुनकर मुन्नी कहती है-'तीन ही तो रूपये हैं, दे दोगे तो कम्मल कहाँ से आवेगा?'
मगर सहना मानेगा नहीं, घुड़कियाँ जमावेगा,गालियाँ देगा।रूपये दे दो, बला तो छूटे।कम्मल के लिये कोई दूसरा उपाय सोचूँगा।'
कर्ज का दबाव इतना अधिक है और गाली गलौच से बदनामी के डर से पूस की रात के ठण्ड को भी नजरअंदाज कर कर्ज का तीन रूपये देकर बला को टालने का ही एक मार्ग शेष है ,हल्कू के पास ,सो वह तीन रूपये देकर ही दम लेता है।
पूस की रात में खेत की रखवाली करना वो भी बिना कम्मल के ये सोच के ही ठण्ड का एहसास हल्कू को अंदर से डरा देता है।
हल्कू ने खेत जाते समय जबरा से खेत न चलने के लिये मना किया और अकेले जाने लगा परन्तु जबरा कहाँ मानने वाला, वह अपने मालिक के साथ चल दिया।खेत पहुँचने पर पूस की अँधेरी रात में कुछ दूर के बाद दिखाई ही नही दे रहा था और उस पर भी ठण्ड की अपरम्पार दिक्कत अलग।हल्कू को खेत के दूसरे कोने से किसी जानवर के खेत चरने के आवाज के कारण उस कोने जाने की भी हिम्मत नहीं पड़ रही है।जबरा भी उसके पास बैठकर रह रह कर भौकता है पर खेत से आवाज आनी बन्द नही होती।
एक तरफ ठण्ड दूसरी तरफ खेत की रखवाली।हल्कू को लगता है आज या तो जॉन जायेगी या खेत बचेगा।खेत बचेगा भी तो कैसे?जबरा भी रह-रह कर ठण्ड से परेशान है ,वो रह-रह कर हल्कू के पास आकर कूँ-कूँ करने लगता है।एक बार जबरा हिम्मत करके खेत के दूसरे तरफ जाता है और फिर वापस आ जाता है।हल्कू सोचता है चलो अब ठीक है पर ठीक हो ऐसा नही है।
ठण्ड से हल्कू और जबरा दोनों परेशान हैं बचाव का कोई उपाय भी नही दिख रहा है।इस पर हल्कू जबरा से कहता है-'मेरे मना करने पर यदि खेत न आये होते तो कम से कम तुमको तो ठण्ड न लगती।
यहाँ हल्कू और जबरा के बीच जो संवाद कहानीकार ने उकेरा है वह दो अलग अलग जीवों का संवाद है।एक मानव और एक जानवर।जबरा एक समझदार जानवर है जो अपने मालिक का वफादार है।वही कहानी में नीलगाय जानवर का भी जिक्र है जो मानव के लिए,विशेषकर उसके खेत के लिए हानिकारक है।ठण्ड का आलम रात के साथ बढ़ रहा है,हल्कू अब परेशान हो रहा है नींद भी तो नही आ रही है और आएगी भी क्यूँ?आदमी को भूख लगी हो तो आदमी पानी पीकर सो तो सकता है पर ठण्ड में बिना गर्म-वस्त्र के या आग के पास जाकर ही ठण्ड से निजात पाई जा सकती है।
हल्कू को लगा कि जबरा को पकड़कर अपने सीने से लगा लूँ तो दोनों को ठण्ड नही लगेगी।जबरा के बदन से दुर्गन्ध के बीच भी हल्कू उसे अपने से चिपकाए रहता है।यहां बड़ा कारुणिक चित्रण है जिसे दो विपरीत जीव अपने-अपने तरीके से हल करते नजर आते है।हल्कू सोचता है कि बदन की एक दूसरे की गर्मी एक दूसरे को ठण्ड से बचा लेगी।
पर इससे काम नही चलता ।रात अभी बहुत बाकी है ।हारकर हल्कू बगल के बगीचे से पत्तियां बटोरकर अलाव जलाता है और कुछ देर के लिए दोनों को राहत मिल जाती है पर अलाव के उतरते ही ठण्ड पुनः प्रभावी हो जाती है।हल्कू अलाव वाली जगह पर ही लेट जाता है।अलाव की गर्मी से थोड़ा आराम मिलने के कारण उसे नींद आने लगती है  जबरा बीच-बीच में आहट पाकर भोकता रहता है पर वो भी ठण्ड के कारण खेत के चारों ओर न जाकर अपने स्थान से ही भोकता है ।हल्कू के नींद में आने पर जबरा भी शांत होने लगता है।दूसरी तरफ खेत में नीलगाय का झुण्ड खेत को चरने के साथ -साथ खेत को रौंद मारतीं हैं।सुबह जब मुन्नी खेत पर आती है तब देखती है हल्कू एक तरफ सो रहा है और जबरा दूसरी तरफ और पूरा खेत तहस-नहस हो चुका है।
मुन्नी ने कहा -'अब मजूरी करके मालगुजारी भरनी पड़ेगी।"
हल्कू ने प्रसन्न मुख से कहा-'अब रात की ठण्ड में यहाँ सोना तो न पड़ेगा।'
पूस की रात का दर्द एक किसान परिवार हल्कू का ही दर्द नही है।ये देश के हर किसान का दर्द है।उस समय के हल्कू की बात हो या आज के हरिया(काल्पनिक किसान का नाम)की बात हो ।समय काल जरूर बदला है पर परिस्थितयां ज्यों की त्यों विद्यमान है।उस समय का हल्कू नीलगाय से परेशान था तो आज का हरिया भी नीलगाय के साथ-साथ अन्य आवारा पशुओं से परेशान है।गाँव में आवारा पशुओं के कारण आज का हरिया मजबूर है।खेती करना दूभर हो गया है।लाख परेशानी से फसल तैयार कर भी ले तो आवारा पशुओं से आज भी नही बचा पा रहा है।कर्ज उस समय भी हल्कू के लिये जी का जंजाल था तो आज हरिया के लिये भी जी का जंजाल है।हल्कू कर्जा लेकर कम्मल नही खरीद पाया तो हरिया कर्जा लेकर आज भी खेती करते हुए कर्जदार ही है।
भारत किसान का देश है जहाँ के पूर्व प्रधानमंत्री श्री लाल बहादुर शास्त्री जी ने कभी नारा दिया था-'जय-जवान,जय-किसान'।उस समय किसान को आशा 
बधी थी कि अब किसान के दिन बहुरेगें,पर ऐसा कुछ हुआ नही।किसानों को इस देश में मिला है तो सिर्फ आश्वासन।भारत में किसान का एक द्वन्द्व हो तब तो,उसे सरकार की तरफ से आश्वासन दर आश्वासन पिछले 73 साल से मिलता चला आ रहा है।भारत का किसान आश्वासन पर जी भी नही रहा है वो तो जीता है अपनी उम्मीद पर।उसे उम्मीद है वो धरती का सीना चीरकर अन्न उपजाता है ,वो भारत को खिला रहा है, उसे कोई खिलाये चाहे न खिलाये वो अपना काम सदा से करता चला आ रहा है।किसान का दर्द देश के अनेकों साहित्यकारों ने अपने -अपने समय में लिखा।कहा जाता है-साहित्य समाज का दर्पण है पर सरकारों ने इसे कभी भी गम्भीरता से नहीं लिया।साहित्य की एक अन्य कला विधा फ़िल्म ने भी भारत के किसानों समस्या को अपनी तमाम फिल्मों के माध्यम से गम्भीरता से उठाया।किसान के जीवन पर आधारित फिल्मों में बलराज साहनी अभिनीत फ़िल्म 'दो बीघा जमीन,मनोज कुमार अभिनीत फ़िल्म 'उपकार'दिलीप कुमार अभिनीत फ़िल्म 'नया दौर'भोजपुरी में सचिन अभिनीत फ़िल्म 'नदिया के पार'जितेंद्र कुमार अभिनीत फ़िल्म :धरती कहे पुकार के'सुनील दत्त,राजकुमार ,राजेन्द्र कुमार और नरगिस अभिनीत फ़िल्म'मदर इंडिया',राजेश खन्ना अभिनीत फ़िल्म'दुश्मन'राजकपूर अभिनीत फ़िल्म 'तीसरी कसम'नवीन निश्छल अभिनीत फ़िल्म'सावन भादों'सुजीत कुमार अभिनीत फ़िल्म'बलम परदेसिया'आदि सैकड़ों फिल्मों में किसान का दर्द उभारा गया पर दुर्भाग्यवश जैसे कथा सम्राट मुंशी प्रेमचन्द की कहानी पूस की रात का भारतीय राजनीति ने किसान केन्द्रित कोई पॉलिसी नही बनी और न ही उपरोक्त फिल्मों का ही भारतीय राजनीति पर गहरा प्रभाव पड़ा।वरना जहाँ फिल्मों के गानों का भी एक लम्बा सिलसिला है जिसमें गाँव के चित्रण के साथ-साथ किसान को भी विषय बनाया गया उनका कुछ तो प्रभाव पड़ना चाहिये।
मनोज कुमार अभिनीत फ़िल्म 'उपकार'का वो गाना जिसे महेन्द्र कपूर ने अपने आवाज से कालजयी बना दिया जिसके बोल थे-'मेरे देश की धरती सोना उगले उगले हीरे मोती,मेरे देश की धरती।'को कोई भुला पायेगा।फ़िल्म' मदर इण्डिया'का वो गाना -'दुनियां में हम आएं हैं तो जीना ही पड़ेगा जीवन है अगर जहर तो पीना ही पड़ेगा'कोई भूल सकता है।शाहरुख़ खान और प्रीती जिंटा अभिनीत फ़िल्म 'वीर-जारा'का ये गीत जिसे लता मंगेशकर उदित नरायण गुरदास मान और पृथा मजूमदार ने अपनी आवाज से नवाजा है -'ऐसा देश है मेरा'में किसान का चित्रण बखूबी किया गया है।
किसान पर साहित्य ने शुरू से काम किया पर किसान आज भी पूस की रात का दंश झेल रहा है।कहा जाता है -'जाय के पैर न फ़टी विवाई,सो का जाने पीर पराई।'
किसान जब भारत की गद्दी पर बैठता तो शायद कुछ हुआ होता पर इस देश की राजनीति तो किसान को वोट बैंक मानकर उन्हें लुभाती है और जब सत्ता मिल जाती है तो फिर सत्ता की मलाई पांच साल खाने के बाद पुनः पांच साल के लिये किसान सुध के साथ किसान के बीच आती है और पुनः सत्ता प्राप्त कर अगले पाँच साल के लिये किसान को भूल जाती है।किसान  वादे पुरे करवाने के लिये वोट पर वोट देता रहता है और अगली सुबह कन्धे पर हल रखकर खेत के लिये निकल लेता है और मजबूरन उन्हीं नेताओं का पेट अपने उपजाये आनाज से करता है जो नेता उसके पेट भरने की बात करके उससे वोट तो ले लेता है पर उसका पेट कैसे भरेगा इस पर अगले पाँच साल तक या तो सोचता ही नही या सिर्फ कागज पर नीतियां बनाता है या फिर सिर्फ किसानों के बीच भाषण में क्या बोलना है उसकी अपने सलाहकारों से स्क्रिप्ट लिखवाता है और किसान के बीच आकर उस भाषण को बोलकर किसान को बरगला उसका वोट पुनः पा जाता है ।किसान इसी विडम्बना में जीवन दर जीवन उलझा वोट देता रहता है कि शायद कभी कोई अच्छा नेता आये और उसे पूस की रात के ठण्ड से निजात दिलाये।
अगली बार कथा सम्राट मुंशी प्रेमचन्द के किसी और कहानी के साथ आपके बीच में उपस्थित होऊँगा।

डॉ0 अखिलेश चन्द्र 
       आजमगढ़
     9415082614

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