आज़मगढ़।
रिपोर्ट: वीर सिंह
आज़मगढ़: इस्लामी कैलेंडर के हिसाब से आठवें महीने शाबान की 15 वीं तारीख को शब-ए-बरात के नाम से जाना जाता है। यह रात इबादत के साथ ही दिन में रोजा रखने की तरफ भी इशारा करता है। इस दिन रोजा रखकर इंसान इबादत और कुरआन की तिलावत में गुजार दें और जाने-अंजाने में किए गए गुनाहों का पश्चाताप करते हुए साफ दिल से तौबा करे तो उसके सब गुनाह माफ हो जाते हैं। इस रात में इंसान अपने एक साल के किए गए कार्यों का भी जायजा लेता है।
वही जानकारी देते हुए जीयनपुर के मौलाना रियासत हूसैन ने बताया कि इस दिन सूर्यास्त से सूर्योदय तक रहमतों की बारिश होती है। शब-ए-बरात को दिन में रोजा रखने व रात में इबादत करने वालों की हर गुनाह माफ कर दिए जाते हैं। यह रात को बुजुर्गी, रहमत और बरकत वाला भी बताया गया है। इस रात में कब्रिस्तानों में जाकर दफन लोगों के लिए मुक्ति की दुआ भी की जाती है।
मौलाना रियासत हुसैन ने बताया कि शब ए बरात से रुहानी साल शुरू होता है। इस रात रब फरिश्तों को जिम्मेदारियां सौंपता है। लोगों के नामे आमाल लिखे जाते हैं। किसे क्या मिलेगा, किसकी जिंदगी खत्म होगी, किसके लिये साल कैसा होगा, पूरे साल किसकी जिंदगी में क्या उतार-चढ़ाव आएगा। ये इसी रात लिखा जाता है साथ ही पुरखों की रूह अपने घरों में लौटती है जिसके चलते लोग घरों को पाक साफ व रौशन रखते हैं।
वही मौलाना रियासत हुसैन ने रोजा रखने की फजीलत बताते हुए कहा कि शब-ए-बारात के अगले दिन रोजा रखा जाता है। माना जाता है कि शब-ए-बारात के अगले दिन रोजा रखने से इंसान के पिछली शब-ए-बारात से इस शब-ए-बारात तक के सभी गुनाह माफ कर दिए जाते हैं।