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संदेशे आते थे, संदेशे जाते थे, जब पोस्ट कार्ड से : डॉ० अखिलेश चन्द्र

आज़मगढ़।

लेख: भारत मे पोस्ट कार्ड का उदय 01 जुलाई 1879 से हुआ।यूँ तो विश्व स्तर पर पोस्ट कार्ड का उदय मेरे जन्म से 100 वर्ष पूर्व 1869 में आस्ट्रिया में हुआ था।मानव का जन्म चाहे आदम और हौआ के द्वारा, मनु और श्रद्धा के द्वारा हुआ हो ,यह विमर्श अलग है पर आपसी सन्देश का आदान-प्रदान मानव में भाषा विकसित होने के पूर्व अवाचिक रही होगी।हर बात के लिये कुछ न कुछ संकेत विकसित रहे होंगे जैसे आज हम किसी को पास बुलाने के लिये गर्दन को सामने झुकाते है जिसे देखकर गर्दन झुकाते है वह व्यक्ति यह समझ जाता है कि मुझे बुला रहें हैं।किसी से हम गुस्सा होते हैं तो उसे देखकर आँख बड़ी-बड़ी कर लेते हैं तो वह व्यक्ति यह समझ जाता है कि साहब हमसे बहुत गुस्सा हैं।किसी को जब पास बुलाना होता है तो उसे देखकर हाथ कंधे के सीध में रखकर हाथ की हथेली के उँगली को सामने की तरफ बार-बार झुकाते हैं वो व्यक्ति समझ जाता है कि मुझे बुला रहें हैं।किसी को आँख से इशारा करतें हैं तो उसके मायने अलग होते हैं पर जिसे देखकर इशारा होता है वो बिना बोले ही इशारे को इशारे में ही समझ लेता है।
यह अवाचिक व्यवहार वाचिक व्यवहार के पहले का व्यवहार रहा होगा जो आज भी चलन में है।भाषा आ जाने के बाद भाषा बोलने और लिखने का चलन शुरू हुआ होगा।यहीं से सन्देश का आदान-प्रदान माना जा सकता है।हमारे पौराणिक सन्दर्भो में भी पत्र-लेखन का उल्लेख मिलता है।रामायण के एक प्रसंग में जब प्रभु श्री राम और माता सीता का स्वयंवर हो जाता है तब माता सीता के पिताश्री जनक जी ने प्रभु श्रीराम के पिताश्री राजा दशरथ को लगन पत्रिका से सूचित किया था और राजा दशरथ ने उसे स्वीकार करते हुए विवाह में सपरिवार भाग लिया था।महाभारत में भी भगवान श्रीकृष्ण कौरवों के पास पांडवो का पांच गाँव देने का प्रस्ताव सन्देश के रूप में वाचिक रुप से लेकर गये थे।यह परंपरा प्राचीन काल से चली आ रही है।
प्राचीन समय मे अलग-अलग काल खंड में पक्षियों के माध्यम से जिनमें कबूतर का उल्लेख बार-बार आता है कि उन्हें माध्यम बनाकर सन्देश भेजे जाते थे।
कबूतर का उल्लेख फ़िल्म-मैंने प्यार किया' में लता जी और एस पी बालासुब्रमण्यम का गाया गाना 'कबूतर जा जा जा कबूतर जा,पहले प्यार की पहली चिठ्ठी साजन को दे आ।कबूतर जा जा जा कबूतर जा।यह राजश्री प्रोडक्शन की फ़िल्म जिसे सूरज बड़जात्या ने निर्देशित किया था और रामलक्ष्मण के संगीत और असद भोपाली और देव कोहली के लिखे गीत से सजी इस फ़िल्म के नायक सलमान खान और भाग्य श्री को रातों-रात स्टार बन दिया था।उस समय से आज तक इस फ़िल्म ने कुल अब तक लगभग 500 करोड़ का कारोबार किया होगा और आगे भी जारी है।
पोस्ट कार्ड का प्राचीन दौर आज की नई पीढ़ी उस रूप में नहीं जानती जिस रूप में कभी इसका क्रेज था।आज की पीढ़ी को सनी देओल अभिनीत फ़िल्म  'बॉर्डर'का वो गीत याद होगा जो था ' संदेशे आते हैं, संदेशे जाते हैं वो चिट्ठी आती है वो पूँछ जाती है, के घर कब आओगे के घर कब आओगे के तुम बिन ये घर सूना-सूना है ,संदेशे आते हैं ,हमें तड़पाते हैं।सोनू निगम और रूपकुमार राठौड़ का गाया यह गाना पत्र-लेखन शैली का अनूठा गाना है जिसके कारण यह फ़िल्म भी सुपर डुपर हिट रही।इस गीत को फ़िल्म फेयर अवार्ड ऑफ बेस्ट गीत का अवार्ड भी मिला था।
हममें से शायद ही कोई हो जो इस गीत का दीवाना न हो।इस गीत में गाँव है, माँ है।यार दोस्त हैं, प्रेयसी है, खेत-खलिहान है, अगल -बगल के परिवेश है नदी है पर्यावरण है और सबसे बड़ी बात अपना देश और अपनी माटी की सोंधी खुशबू है।इसी कारण इस पत्र-लेखन गीत में भारत बसता है।
आज के दौर के बच्चों के लिये शायद पोस्ट कार्ड अब बीते दिनों की बात हो चली है।कुछ ने तो शायद इसे देखा भी न हों और शायद इसे देखने की उनको जरूरत भी न हों।यहाँ किसी पर कोई आरोप प्रत्यारोप भी नही है, कि उन्होंने इसे क्यों नही देखा? बस यह जानने के लिये कि पोस्ट कार्ड का भी अपना एक क्रेज हुआ करता था।आज सन्देश का आदान -प्रदान व्हाट्सएप, फेशबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम, ईमेल,मोबाइल पर बात करके आमने-सामने लाइव करने का दौर चल पड़ा है।यह आधुनिक भी है और आज की जरूरत भी।
पोस्ट कार्ड लिखने की संस्कृति 152 वर्ष पूर्व की है यानी लगभग यह हमारी तीसरी पीढ़ी में स्थानांतरित होती चली आ रही है।पोस्ट कार्ड एक रूप में उस समय या आज का सबसे सस्ता सन्देश वाहक था।जब से मै जनता हूँ यह 10 पैसे से चलन में है और आज 10 से 15,15से 25 और अब 25 से 50 पैसे के साथ अपने चलन को बनाये हुये है।इसमें एक बात जो होती है वो यह कि इस पर जो आप लिखते हैं वह गोपनीय नहीं रह सकती क्योंकि इसे ढकने के लिये कोई विकल्प नही है पर हाँ!इससे इसके क्रेज पर कोई असर नही रहा।इसकाकारण है इसका मूल्य,जिसके कारण यह सभी के पहुँच है।अपने समय के एक से एक साहित्यकार,राजनीतिकार,वैज्ञानिक,शैक्षिक, खिलाड़ी,कृषि,संगीत, कला,चित्रकार, मूर्तिकार,चाहे जिस भी फील्ड का व्यक्ति हो सभी इसका उपयोग करते थे।भारत के राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी जी ने इसका बहुत उपयोग किया।भारतीय डाक व्यवस्था ने इसी को ध्यान में रखते हुए 02 अक्टूबर 1951 और पुनः 1969 में इस पर गाँधी जी के चित्र अंकन का भी काम किया जिससे यह जनमानस में और मजबूती से अपनी भूमिका का निर्वहन करने लगा।पत्र लेखन का भी अपना एक अलग साहित्यिक विमर्श है।बड़े-बड़े राजनयिक लोगों के बीच,साहित्यकारों के बीच के पत्र पुस्तकों में छपते है और खूब बिकते भी हैं।
गाँव में पत्र-चलन पर एक कहावत आम थी कि 'हम तो पत्र का मजनून जान जाते हैं लिफाफा देखकर'इस कहावत जा चलन पोस्ट कार्ड के बाद आया क्योंकि पोस्ट कार्ड खुला ही रहता था इसको भांपने की जरूरत ही नही थी जो कुछ भी था सब फ़िल्म अभिनेता ऋषि कपूर की हालिया प्रकाशित पुस्तक'खुल्लमखुल्ला'की तरह।कुछ भी ढका हुआ नहीं।
पोस्ट कार्ड पर लिखावट से भी व्यक्ति की पहचान हो जाती थी कि व्यक्ति अच्छा होगा या अच्छा नहीं ,हालांकि यह कभी-कभी गलत भी होता था।किसी की हैंडराइटिंग अच्छी नहीं होती पर व्यक्ति देखने मे सुंदर और व्यवहार कुशल हो सकता है और कभी-कभी हैंडराइटिंग अच्छी होते हुये व्यक्ति न तो अच्छा और न तो व्यवहार कुशल होता था।
पोस्ट कार्ड का एक पक्ष यह भी था कि इधर का गया पत्र उधर से लौटने में महीनों लगते थे क्योंकि उस समय की डाक व्यवस्था इतनी अच्छी नही थी जितनी आज की है।
डाक व्यवस्था पर एक फ़िल्म 'पलको की छांव में'गुलज़ार साहब द्वारा लिखी बनी थी जिसमें राजेश खन्ना और हेमा मालिनी ने अभिनय किया था उस फिल्म का किशोर कुमार का गाया गाना और लक्ष्मी कांत प्यारे लाल का संगीतबद्ध गीत 'डाकिया डाक लाया डाकिया डाक लाया'आज भी सुना जाता है।
पोस्ट कार्ड खुला होने के बावजूद भी लोग इस पर अपने मन की बात बड़ी बेबाकी से लिखते थे और दोनों पक्ष अपने-अपने पोस्ट कार्ड को महीनों ,सालों,अपने साथ या अपने-अपने तकिया के नीचे रखकर उनकी लिखी बातों में नए पत्र के आने या जाने के बीच खोए रहते थे,जिसे आज कल खुमार कहते हैं ।खुमार का मतलब अपनी सुध-बुध खोना।पत्र जाने पर पत्र पढ़कर उसे बुरा न लगे का इंतजार महीनों रहता था,डर भी सताता था कही कोई गलत आचरण वाला न समझ लें, और पत्र आ जाने पर कोई उसे मुझसे पहले न पढ़ ले और पत्र सही -सही ही आये और किसी और के हाथ न लगे इसके लिये नवयुवक और नवयुविती डाकिया से ही सांठ-गांठ बिठाते थे कि जब भी मेरा पत्र आये सिर्फ मुझे देना नही तो बवाला मच जाएगा।
इस प्रसंग का फ़िल्म 'संगम'का गीत बड़ा प्रासंगिक है।इस प्रेम त्रिकोड फ़िल्म में उस समय के शो मैन राजकपूर,राजेन्द्र कुमार और वैजन्तीमाला ने अभिनय किया था।संगीतकार शंकर जयकिशन और गीतकार शैलेंद्र जी का लिखा और मोहम्मद रफ़ी का गाया और राजेंद्र कुमार और वैजन्तीमाला पर फिल्माया यह गीत'ये मेरा प्रेम पत्र पढ़कर के तुम नाराज ना होना के तुम मेरी जिंदगी हो के तुम मेरी बंदगी हो'आज भी बड़े चाव से सुना जाता है।
पोस्ट कार्ड ने भी हर दिल की धड़कन जैसे पहिचान रखी थी,कभी इसमें इत्र लगाकर पत्र लिखा जाता था तो कभी हल्दी।गम का पत्र होने पर इसे किसी कोने से हल्का सा फाड़ दिया जाता था।इत्र या हल्दी का पत्र तो जैसे खुशियों का पैगाम लेकर आते थे और जैसे ही मिलते थे लोग और परिवार झूम जाते थे पर फटा पत्र गम में लोगों को डूबा देते थे।
प्रसंगवश फ़िल्म'कन्यादान' (1968)का जिक्र भी आना चाहिये ।इस फ़िल्म में शशि कपूर और आशा पारेख पर फिल्माया गया नीरज का लिखा और मोहम्मद रफ़ी का गाया और शंकर जयकिशन का संगीतबद्ध गाना किसे याद नही है ।गीत के बोल थे'लिक्खे जो खत तुझे वो तेरी याद में हजारों के रंग के नज़ारे बन गये, सवेरा जब हुआ तो फूल बन गये, जो रात आयीं तो सितारें बन गये'।
जब कोई बेटा बॉर्डर से अपनी माँ या पिता या प्रेयसी को पत्र लिखता था तो पत्र ही जिंदगी हो जाया करती थी।दिल के जज्बात कलम से पोस्ट कार्ड पर आते थे और अगली बार होली की छुट्टी या दीपावली की छुट्टी में घर आऊंगा ये बताते थे तो होली और दीपावली का दिन कब आएगा यह तड़प होली या दीपावली तक बनके तड़पाते थे और कमबख्त जब आ जाती थी होली और दीपावली तो समय जैसे पंख लगाकर उड़ जाते थे और फिर से पत्र का आना-जाना ही जीवन बन जाता था। बेटा भी जब गाँव आता तो कभी खाली हाथों नहीं आता था।हाथ मे मिठाई, मां के लिये दवाई,पिता के लिये पहनाई, बहन के लिये रक्षाबंधन पर आने पर अपनी कलाई और भाई के लिये पढ़ाई की दुहाई और न जाने कितनी जद्दोजहद अपने गाँव के मित्रों और रिश्तेदारों के लिये क्या-क्या लेकर आता था और जाते वक्त पहुँचने पर जल्द पोस्ट कार्ड से सूचित करना कि पहुँच गया।उसके पहुँचने की सूचना तक सभी का जी कही न कहीं परेशान रहता कि ठीक आए पहुँचा कि नहीं।हर रिश्ता अपने तरह से कुशल क्षेम की सलामती की दुआ मांगता।जैसे ही पत्र आ जाता सभी प्रसन्न हो जाते और फिर शुरू हो जाता पत्र आने और जाने का सिलसिला।
भारतीय जनमानस में कभी-कभी ताउम्र यह पत्र ही रिश्ते की सेतु हुआ करते थे।दूर रहने वाले लोग इसी से अपना जीवन काट लेते थे।माँ-बाप ,बीबी-बच्चे,भाई-बहन के जीवन की एक आश यह पत्र ही हुआ करते थे।घर से दूर रहने वाले का भी जीवन का पक्ष यह पत्र ही हुआ करते थे।यह दोनों के जीवन का सहारा और सम्बल हुआ करते थे।भोजपुरी के शेक्सपियर'भिखारी ठाकुर का नाटक 'बिदेशिया'तो सन्देश वाहक के बीच मे ही रचा और बसा है।आज भी बिदेशिया की धुन जैसे कानों में संकट के पल को याद दिलाती है।याद कीजिए क्या विदेशी अगर कलकत्ता न गया होता तो बिदेशिया इतना लोकप्रिय होता,शायद नही।यह इतना लोकप्रिय इसलिए हुआ कि भारत की अधिकांश जनता रोजी रोटी के लिये घर से बाहर जाती है और फिर सन्देश के इंतजार में पत्र लेखन पोस्ट कार्ड ही उसका सहारा बन जाता है।
उस समय भारत मे नारी शिक्षा के प्रति रुझान कम होने के कारण स्त्रियां अपने पत्र पढ़वाने और लिखवाने के लिये भी बहुत परेशान रहती थी और कभी-कभी धोखाधड़ी का भी शिकार हो जाती थी। यह स्थिति अनपढ़ पुरुषों को भी झेलनी पड़ती थी पर बाहर की दुनियां में होने के कारण उनकी समस्या थोड़ी कम थी पर स्त्रियां अपने मन की बात किसी और से कैसे लिखवाती होंगी यह सोचकर ही मन व्यथित होता है।
इस भावना पर एक फ़िल्म 'वेलकम टू सज्जनपुर'अभी हाल में रिलीज हुई थी जिसकी नायिका अनपढ़ है और वो गाँव के पढ़े लिखे नायक से पत्र लिखवाती है और नायक उसके कहे बात को न लिखकर अपने स्वार्थ के अनुसार उसके पत्र को ईधर उधर लिखकर उसे बहलाता है और उसका शोषण करने की कोशिश करता है, पर हालात इतने नही बिगड़ते बाद में उसका पति गाँव वापस आ जाता है और नायिका सुरक्षित बच जाती है।
यह पत्र-लेखन पर आधारित एक सन्देश परक फ़िल्म थी जिसमे यह बताने की भी कोशिश थी कि अशिक्षा हर समस्या की जड़ है ।पत्र का अपना एक लम्बा इतिहास है।आप सभी को यह जानकार हैरानी होगी कि यह पोस्ट कार्ड जो हमें इतने कम पैसे में मिलता है उस पर भारत सरकार अपनी सब्सिडी देती है वरना इसका मूल्य लागत के हिसाब से अधिक है।यह हम सब की जरूरत है इसलिए इस पर सब्सिडी मिलती है।यह आज से नहीं इसके शुरुआत से चली आ रही है और बदस्तूर जारी है।
आज के दौर में पोस्ट कार्ड की अहमियत थोड़ी कम हो गयी और इसकी जगह बंद लिफाफे ने और अंतरदेशीय पत्र ने ले लिया।लिफाफा जो 5 रुपये का मिलता है और अंतरदेशीय पत्र 2 या 3 रुपये का मिलता है।यह बात भी अफ़सोस के साथ लिख रहा हूँ कि धीरे-धीरे यह तीनों सन्देश वाहक अब बंद के कगार पर पहुँच गए हैं।पोस्ट कार्ड सरकारी नौकरी के विज्ञापन में अपनी जगह बना के रह रहा था,पर अब ऑनलाइन फॉर्म भरे जाने के दौर में वह भी अब लुफ्तप्रायः बन कर रह गया है।
आधुनिक तकनीकी ने जीवन को सरल किया है ।आज उसकी जरूरत भी है और समय की बचत के दृष्टिकोण से आवश्यकता।पर जो बात खत में थी वो बात इसमें नहीं।खत या पत्र मानव की संवेदना के प्रकटीकरण का सार थे।आप उसमें रो सकते थे,अपने दिल की हर बात सन्देश के माध्यम से सन्देशवाहक तक पहुँचा सकते थे और वो भी बिना लागलपेट।
आज सोशल मीडिया के दौर में कोई भी बात प्राइवेसी के रूप में नही रह पा रही है।पत्र के समय मे प्राइवेसी भी थी और संवेदना भी।
आज पोस्ट कार्ड के साथ बस इतना ही मिलते हैं फिर किसी अन्य पुरानी वस्तु के साथ जल्द से जल्द।

लेख:- डॉ0 अखिलेश चन्द्र 
एसोसिएट प्रोफेसर शिक्षा संकाय श्री गाँधी पी जी कॉलेज, मालटारी,आजमगढ़

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