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ग्रामीणों की आय में आज भी कारगर साबित होता गाय का गोबर।


आज़मगढ़।

रिपोर्ट: गौरव सिंह राठौर

आज़मगढ़: सगड़ी तहसील क्षेत्र में यदि ग्रामीण क्षेत्रों की बात की जाए तो गांवों में गोबर की जरूरत किसी से छुपी नही है। जिन घरों में पशुधन का उपयोग किया जाता है, वहां गोबर को घर और खेत के कई कामों में उपयोग लाया जाता है बरसों से गाय के गोबर की अहम भूमिका रही है चाहे वह खाना पकाने के लिए उपयोग की गई लकड़ी के रूप मे हो या फिर खेतों में उर्वरक के रूप में हर जगह कारगर ही साबित होता चला रहा है। आज हम गाय के गोबर की बात इसलिए कर रहे हैं क्योंकि आज भी अनेक घरों में गाय के गोबर इस्तेमाल किए जाते हैं। आपको बताते चलें कि हिन्दू धर्म में यदि आप पुरानी कथाओं और गाथाओं का अध्ययन करेंगे तो पाएंगे कि किसी भी धार्मिक अनुष्ठान पहले उस जगह को गाय के गोबर से लीपने का उल्लेख किया जाता है। इसके पीछे धार्मिक कारण गोबर में लक्ष्मी का वास माना जाना है। एक बहुप्रचलित कथा के अनुसार जब गाय के शरीर के हर अंग में देवताओं ने वास कर लिया तो लक्ष्मीजी ने पूछा कि अब मेरा वास कहां होगा! तो अंततः उन्होंने गाय के गोबर में अपनी जगह सुनिश्चित की। इसलिए किसी भी धार्मिक कार्य में गाय के गोबर से स्थान को पवित्र किया जाता है। आज भी गांवों में महिलाएं सुबह उठकर गाय गोबर से घर के मुख्य द्वार को लिपती हैं। माना जाता है कि इससे लक्ष्मी का वास बना रहता है। प्राचीन काल में मिट्टी और गाय का गोबर शरीर पर मलकर साधु संत स्नान भी करते थे।

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