लेख।
लेख: सौरमण्डल के सभी नौ ग्रहों में केवल पृथ्वी पर जीवन और प्रचुर मात्रा में जैव विविधता पाई जाती हैं। इसलिए पृथ्वी को अद्भुत ग्रह कहा जाता हैं। पृथ्वी समस्त जीवों का पालन पोषण तो करती हैं मनुष्य के शौक श्रृंगार को भी पूरा करती हैं। मनुष्य सहित समस्त जीव जंतुओं को स्वस्थ जीवन प्रदान करने वाली पृथ्वी ही अगर अस्वस्थ, प्रदूषित और कुपोषित हो गई तो हमारी भावी पीढ़ियों का जीवन संकट में पड जायेगा।
पृथ्वी अनगिनत जीव जंतुओं का प्रसव प्रांगण के साथ-साथ सभी प्राणियों का क्रीडांगन भी हैं। विकास की अंधी दौड़ में मनुष्य जिस तरह प्राकृतिक संसाधनों का निर्ममता पूर्वक शोषण कर रहा है उससे सम्पूर्ण पृथ्वी को आच्छादित करने वाला पर्यावरण निरन्तर प्रदूषित होता जा रहा हैं। अगर प्राकृतिक संसाधनों का विदोहन इसी तरह जारी रहा और इसी रफ्तार से हमारा पर्यावरण प्रदूषित होता रहा तो भावी पीढियों की किलकारियों के स्वर , भौरौ के गुंजन, पक्षियों के कलरव और दिगदिगंत तक गुंजित होने वाले गीतों के स्वर मद्धिम हो जायेगे । इसलिए अपनी प्यारी पृथ्वी और पृथ्वी के पर्यावरण को बचाना हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है। बुलेट ट्रेन की रफ्तार से बेशुमार दौलत कमाने की आसमानी महत्वाकांक्षा रखने वाली बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने लगभग पूरी पृथ्वी को अपनी मुट्ठी में भींच लिया है। जिससे हमारी पृथ्वी के अस्तित्व पर संकट आ गया हैं। पृथ्वी के अस्तित्व को बचाने की गरज से अमेरिकी सीनेटर जेराल्ड नेल्सन ने 1970 मे पृथ्वी दिवस मनाने की परिकल्पना प्रस्तावित की। तबसे यह परम्परा स्थापित हूई कि- हर वर्ष 22 अप्रैल को विश्व के सभी देश पृथ्वी दिवस के रूप में मनायेगे।
पृथ्वी अनगिनत जीव जंतुओं का प्रसव प्रांगण के साथ-साथ सभी प्राणियों का क्रीडांगन भी हैं। विकास की अंधी दौड़ में मनुष्य जिस तरह प्राकृतिक संसाधनों का निर्ममता पूर्वक शोषण कर रहा है उससे सम्पूर्ण पृथ्वी को आच्छादित करने वाला पर्यावरण निरन्तर प्रदूषित होता जा रहा हैं। अगर प्राकृतिक संसाधनों का विदोहन इसी तरह जारी रहा और इसी रफ्तार से हमारा पर्यावरण प्रदूषित होता रहा तो भावी पीढियों की किलकारियों के स्वर , भौरौ के गुंजन, पक्षियों के कलरव और दिगदिगंत तक गुंजित होने वाले गीतों के स्वर मद्धिम हो जायेगे । इसलिए अपनी प्यारी पृथ्वी और पृथ्वी के पर्यावरण को बचाना हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है। बुलेट ट्रेन की रफ्तार से बेशुमार दौलत कमाने की आसमानी महत्वाकांक्षा रखने वाली बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने लगभग पूरी पृथ्वी को अपनी मुट्ठी में भींच लिया है। जिससे हमारी पृथ्वी के अस्तित्व पर संकट आ गया हैं। पृथ्वी के अस्तित्व को बचाने की गरज से अमेरिकी सीनेटर जेराल्ड नेल्सन ने 1970 मे पृथ्वी दिवस मनाने की परिकल्पना प्रस्तावित की। तबसे यह परम्परा स्थापित हूई कि- हर वर्ष 22 अप्रैल को विश्व के सभी देश पृथ्वी दिवस के रूप में मनायेगे।
यह सर्वविदित तथ्य हैं कि- विकास करने और खुशहाल जीवन जीने में प्राकृतिक संसाधन महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। परन्तु इन संसाधनों का मूर्खतापूर्ण उपभोग और उपयोग अनगिनत प्रकार की सामाजिक, आर्थिक और पर्यावरणीय समस्याएं पैदा कर सकता हैं। इसलिए भावी पीढियों को ध्यान में रखते हुए विकास की योजनाए निर्धारित करनी होगी तथा संसाधनों का संरक्षण आवश्यक है। इसलिए प्रायः अत्यंत प्राचीन काल से प्रत्येक समाज में चिंतक और विचारक संसाधनों के संरक्षण पर अपने विचार प्रकट करते रहे हैं। इस संबंध में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने कहा है कि- प्रकृति में प्रत्येक की आवश्यकता पूरी करने के लिए सबकुछ है परन्तु किसी की लालच को पूरा करने के लिए नहीं। अर्थात हमारे पेट भरने के लिए बहुत है लेकिन पेटी भरने के लिए नहीं। महात्मा गाँधी के अनुसार संसाधनों के ह्रास्व के लिए स्वार्थी व्यक्ति तथा आधुनिक प्रौद्यौगिकी की शोषणकारी प्रवृत्ति जिम्मेदार हैं । इसलिए वह व्यापक जन भागीदारी द्वारा लघु कुटीर उद्योग धंधों पर आधारित अर्थव्यवस्था के पक्षधर थे। अंतराष्ट्रीय स्तर पर व्यवस्थित तरीके से संसाधनों के विवेकपूर्ण इस्तेमाल और संसाधन संरक्षण की वकालत 1968 मे क्लब ऑफ रोम ने की। इसके बाद 1974 मे शुमेसर ने अपनी पुस्तक "स्माल इज ब्यूटीफुल " में इस विषय पर गांधी जी के दर्शन को एक बार फिर से दोहराया हैं। 1987 मे ब्रुन्ड्टलैंड आयोग रिपोर्ट द्वारा वैश्विक स्तर पर संसाधन संरक्षण में मूलाधार योगदान किया गया। इस रिपोर्ट ने सतत् पोषणीय विकास ( Sustainable Development) की संकल्पना प्रस्तुत की और संसाधन संरक्षण की वकालत की। सतत् पोषणीय विकास का अर्थ है भावी पीढ़ियों के भविष्य को ध्यान में रखकर और पर्यावरण कोई क्षति पहुंचाएं बिना संसाधनों का प्रयोग करना।
लेख: मनोज कुमार सिंह प्रवक्ता