आज़मगढ़।
रिपोर्ट: वीर सिंह
बांसों के बागवान ही खत्म हो रहे
बांस कारीगरों की जीवन शैली में नहीं हुआ बदलाव
आज भी दाने-दाने को मोहताज है बांस कारीगर
आज़मगढ़: बांस की कारीगरी की बात की जाए तो यह काम एक विशेष वर्ग को दे दिया गया था जिसको डोम समाज के नाम से जाना जाता है लेकिन विगत वर्षों में कई अन्य लोग भी इसे अपनी आमदनी का स्रोत बनाकर अपना जीवन यापन करते थे जैसा कि आपको पता होगा की छठ पर्व में बास के बरतन व अन्य सामानों का महत्व बढ़ जाता है। बास के सूप, दौरा, सुप्ती आदि के बिना आस्था के इस महान पर्व में सबकुछ अधूरा हो जाता है लेकिन यही सामग्री बनाने वाले की आज बदहाल स्थिति है। इसका मुख्य कारण यह की बांसों के बागवान ही खत्म हो रहे हैं और उनकी संख्या कम होने के कारण महंगाई अत्यधिक तेजी से बढ़ रही है और जैसा कि आपको पता होगा कि यह गरीब लोग होते हैं इनके पास कोई खेत नहीं होता इनको भी बाहर से खरीद कर ही लाना होता है और ऐसे में बांस की खेती कम होने के नाते उन के दामों में बढ़ोतरी हो गई है ऐसे अनेकों घर सगड़ी तहसील क्षेत्र में निवास करते हैं जो दिन भर काम करने के बाद भी इनके लिए दो वक्त की रोटी का जुगाड़ करना मुश्किल भरा हो रहा है। आज भी मिट्टी की झोपड़ी में सुविधाओं के बगैर इनके सपने दम तोड़ रहे हैं। न ही बच्चों को अच्छी शिक्षा दे पा रहे हैं और न ही जरूरतें पूरी हो पाती है।