लेख।
लेख: सावन की शिव भक्ति और शिव के प्यार का वो अल्हड़पन जिसके एहसास से मन रोमांचक हो जाता है। इस पावन माह के साथ ही यादों में सिमटता जा रहा शिव के सावन का पवित्र कारवां।एक समय था जब सावन माह के आरंभ होते ही घर के आंगन में लगे पेड़ पर झूले पड़ जाते थे और महिलाएं कजरी गीतों के साथ उसका आनंद उठाती थी। जिस पल की आज याद आती है तो जैसे लगता है कि मन में मयूर के नाच उठते हैं। जिसकी कोमल याद है आज भी रोम-रोम को तरोताजा कर देती है इस पवित्र माह का वो कजरी गीत कजरी गीत जिसे सुनने के लिए आज के बुजुर्गों के कान तरस रहे हैं।ऐसे में सावन के झूले भी इतिहास बनकर हमारी परंपरा से गायब हो रहे हैं। अब सावन माह में झूले कुछ जगहों पर ही दिखाई देते हैं। वह भी केवल नाम स्वरूप।सावन के गीत जैसे… सावन के झूलों ने मुझको बुलाया मैं परदेसी घर वापस आया…. सावन आया बादल छाए… जैसे सावन के गानों पर युवक-युवतियां नाचती हुई नजर आती थी। पर अब सभी मधुर गाने डिस्को में बदल गए हैं। सावन का महीना आते ही गांव और शहर के मोहल्लों में झूले पड़ जाते थे। सावन की मल्हारे गूंजने लगती थी। ग्रामीण युवतियां व महिलाएं एक जगह देर रात तक सावनी गीत गाकर झूला झूलने का आनंद लेती थी। वही जिन नवविवाहिताओं के पति दूरस्थ स्थान पर होते थे उनको इंगित करते हुए विरह गीत सुनना अपने आप में लोक कला का ज्वलंत उदाहरण हुआ करता था। झूले की पेंगों पर नवयुवतियों का अल्हड़ गायन शैली अब यादों में सिमट कर रह गई है। सामाजिक समरसता की मिसाल, जाती-पाती के बंधन से मुक्त अल्हड़पन लिए बालाओं की सुरीली किलकारियां भारतीय सभ्यता का वह अंदाज ही निराला था। सावन को अपनी मस्ती में सराबोर देखने हो तो किसी गांव में चले जाइए जहां पेड़ों कि डालो पर झूला डाले किशोरियां, नवयुवतियां या फिर महिलाएं अनायास ही दिख जाती थी। सावन के झूले मस्ती और अठखेलियां का प्रतीक होते थे। पूरे गांव में आम, नीम, इमली के पेड़ों पर कई जगह झूले डाले जाते थे। इस पर युवक वह बच्चे मस्ती किया करते थे। विशेष बात यह थी कि इस झूले पर सभी जाति के लोग झूलते। बुद्धिजीवी वर्ग सावन के झूलों के लुप्त होने की प्रमुख वजह सुख सुविधा और मनोरंजन के साधनों में वृद्धि को मान रहे हैं। आधुनिकता की चकाचौंध में प्रसिद्ध कजरी व रिमझिम फुहारों के बीच झूला झूलने की परंपरा अब अतीत की यादें बनती जा रही हैं। कजरी के रस में डूबने की बजाए महज कुछ प्रतियोगिताओं का आयोजन कर पूर्व की परंपराओं को मात्र निभाया जा रहा है। सावन मास चढ़ते ही जगह-जगह के फुहारों की बीच झूला झूलते हैं महिलाएं प्रसिद्ध कजरी अपने बलमा के जगावे सावर गोरिया, चूड़ियों से मार-मार के तथा कैसे खेले जईबु सावन में कजरिया, बदरिया घेरे आई ननदि आदि गीत गाते हुए बरबस ही सबका मन मोह लेती थी। इन गीतों में सौंदर्य, श्रृंगार, भावों की अभिव्यक्ति होती थी। अश्लीलता का नामोनिशान नहीं होता था, लेकिन एक दशक से यह सारी लोक परंपराएं धीरे-धीरे विलुप्त होती जा रही है। कुछ महिलाएं ग्रामीण क्षेत्रों में इस परंपरा को जीवंत रखने के लिए झूले लगाकर कजरी आदि गीत गाकर सावन मास का एहसास कराती हैं।
रिमझिम बरसेले बदरिया,
गुईयां गावेले कजरिया
मोर सवरिया भीजै न
वो ही धानियां की कियरिया
मोर सविरया भीजै न।
इन गीतों के जरिए महिलाएं जो अपने अनन्य प्रेम और निस्वार्थ सेवा को दर्शा दी थी वह दृश्य धन्य था लेकिन आज की बदलती दुनिया में यह चीजें विलुप्त सी होती नजर आ रही है.
"झूला तो पड़ गयो अमवा की डार मा, मोर-पपीहा बोले..!" ऐसे कुछ बुंदेली गीत हैं, जो सावन मास आते ही गली-कूचों और आम के बगीचों में गूंजने लगते थे। साथ ही मोर, पपीहा और कोयल की मधुर बोली के बीच युवतियां झूले का लुफ्त उठाया करती थीं। अब न तो पहले जैसे आम के बगीचे रहे और न ही मोर की आवाज सुनाई देती है। यानी बिन 'झूला' झूले ही सावन मास गुजर गया। सावन का जिक्र होते ही दिलोदिमाग़ में आसमान से झरती रिमझिम फुहारें, फिज़ा से बहती मंद-मंद शीतल हवाएं और नीम के पेड़ की डाली से लटकते झूले पर झूलती हुई गांव की गोरियां और उनके मधुर स्वरों में गूंजती कजरी जीवंत हो जाती है। सावन के हरियाली भरे महीने में गांव में होने का अपना अलग मज़ा होता है। लेकिन दुख दुख तब होता है जब गांव से भी यह चीज है धीरे-धीरे विलुप्त होते जा रहे हैं कहा जाता है कि भारतवर्ष गांव में ही बसता है लेकिन ऐसा लग रहा है जैसे हमारे प्राचीन सभ्यता और संस्कृति गांव से भी मुंह मोड़ रही है।
लेखक: गौरव सिंह राठौर