कविता।
हम रोज़ जहर पीते हैं फिर भी नीले नहीं होते
एकबार विष पी कर नीलकंठ हो गए थे शिव,
हम रोज़ जहर पीते हैं फिर भी नीले नहीं होते ।
अब नहीं बरसती है उसकी जुल्फे घटा बनकर,
इसलिए बारिशों के मौसम में भी हम गीले नहीं होते।
उसकी रंगो-रवायत मे मुक्कम्ल डूब जाने की हसरत है ,
हर किसी की किस्मत में हर मौसम रंगीले नहीं होते।
हलक तक आते-आते अक्सर छलक जाते हैं पैमाने
पर हर शहर के मैकदों के हर ज़ाम नशीले नहीं होते।
जख़्मी हाँथों से भी गेंदा,गुलाब गुडहल उगाते रहते हैं,
मुहब्बत की इन रवायतों से रूबरू हर कबीले नहीं होते।
बाजारवादी दौर में बदन की नुमाईश पर गीत गजल लिखने का चलन है,
अब तो हमारे गाँव की झुरमुटों से भी कोयल के गीत सुरीले नहीं होते।
दौलत की चौखटों और चकाचौंध में बिकने लगे ऊसूल सिद्धांत और आदर्श ,
अब तो शहादत के शानदार किस्से कहानियों से हर कलेजे जोशीलै नहीं होते ।
विज्ञापनों की चमक दमक से सजने संवारने लगे हैं फलों के बाजार
अब देशी देहाती झुके फेडो की डालियों के फल भी रसीले नहीं होते।
गरीबी,भूखमरी कुपोषण सब कुछ मिटाने का वायदा किया था रहबर रहनुमाओं ने
पर तुम्हारे कोरे-कागजी भाषणों से नौनिहलो के बदन गठीले नहीं होते।
गरीब किसान भी पालते-पोसते है बेटियों को अपनी बेशकीमती फसलों की तरह,
पर मुफलिसी की आगोश में लिपटे गरीब किसान की हर बेटियों के हाथ पीले नहीं होते।
मनोज कुमार सिंह लेखक/ साहित्यकार