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लेख।
आज कथा सम्राट मुंशी प्रेमचन्द की लिखी कहानी"ठाकुर का कुआँ"पढ़ने का सुअवसर निकाला।कहानीकार ने इस कहानी में सामाजिक दृष्टि से दो भारत का जिक्र किया है।1.उच्च वर्ग -जिसे कानून से कोई डर नहीं और 2.निम्न वर्ग -जिसके लिये कोई कानून है ही नहीं।
कहानी इन्हीं दो वर्ग में विचरण करती है।जोखू और गंगी निम्न वर्ग के प्रतिनिधि हैं और ठाकुर साहब उच्च वर्ग के प्रतिनिधि।सामाजिक रूप से एक कहावत कही जाती है कि -'प्यासा हमेशा कुएं के पास जाता है ।'यह कहावत उच्च वर्ग पर तो सटीक बैढ़ती है ,पर निम्न वर्ग के लिये प्यास तो है कहावत भी है पर कुआँ होकर भी उसके लिये कुआँ नही है।प्यास लगे तो लगे ,कुआँ हो भी तो पानी लेने का अधिकार नहीं।
भारत के इस दो वर्ग का अपना लम्बा इतिहास रहा है और कभी-कभी तो आत्मग्लानि भी होती है कि जोखू जैसे मजदूर से जब कुआँ खुदवाया जाता है तब छुआ-छूत का जिक्र नहीं आता,जब घर बनवाया जाता है तब छुआ-छूत का जिक्र नहीं आता,जब खेत में अनाज पैदा करने के लिए मजदूरी करवायी जाती है तब छुआ-छूत नहीं होता,पर जैसे ही कुएँ से पानी निकल आये,घर बन कर तैयार हो जाय और फसल कट कर घर आ जाय ।यह छुआ -छूत की बीमारी उच्च वर्ग में न जाने कहाँ से उपज आती है और पीढ़ी दर पीढ़ी आगे भी बढ़ती रहती है।
कहानी को प्रेमचन्द जी जिस समय रच रहे थे उस समय का सामाजिक ढांचा जैसा था वैसा उन्होंने उस समय लिखा ,आज इस पर सहमति और असहमति हो सकती है ।बहुत सारे लोग ऐसे सामने आ सकते है कि बात पुरानी हो गयी है ,अब जमाना बदल गया है।ठाकुर का कुआँ कहानी का दौर अब ख़त्म हो गया है।ये बातें सिर्फ और सिर्फ बातें हैं,वो भी शहरों में अधिक और गाँव की बात में अभी भी बहुत बदलाव की जरूरत है।बदलाव आ भी रहा है।शिक्षा से कुछ भ्रांतियां दूर हो भी रही हैं,पर अभी भी दिल्ली बहुत दूर है।
जोखू के इस कथन-'ये कैसा पानी है?मारे बास के पिया नही जाता।गला सुखा जा रहा है और तू सड़ा हुआ पानी पिलाये देती है।'से शुरू होती है।मैं दावे के साथ यहाँ एक बात लिख रहा हूँ कि इस कहानी के पहले कथन को पढ़कर ही कोई भी पाठक बिना पूरी कहानी पढ़े रह ही नही सकता। एक कहानीकार का पहला फ्रेम यह होता भी है कि कोई पाठक उसे क्यों पढ़े?लिखने को तो रोज लाख लोग लिख रहें हैं, प्रेमचन्द के समय भी लिख रहे थे पर उनमें से कुछ को छोड़कर बाकी का अता-पता भी नहीं है कि कौन क्या लिख रहा था ,परन्तु प्रेमचन्द कालजयी रचनाकार के रूप में आज अपनी लेखनी से विद्यमान हैं ।
कहानी की रोचकता ,रहस्य,मौलिकता,जिज्ञासा और समाज की समस्या प्रेमचन्द को कालजयी रचनाकार बनाती है।मानव सभ्यता का आरम्भ जब से माना जाता है तभी से मनुष्य-जाति के लिये मनुष्य ही सबसे विकट पहेली है।मानव को मानना, मानव न जाने कब सीखेगा।अपनी जाति का दंभ भी वह मानवता पर दबंगई से बनाये रखना चाहता है, जबकि दबंगई ज्यादे देर चलती नही हैं क्योंकि काल चक्र का एक निश्चित चक्र है ।आज अगर घड़ी में बारह बजे हैं तो कल भी बारह बजेगा यह निश्चित है परन्तु इसे अहंकारी मानव मानने को तैयार नही है।
मानव का जन्म मानवता के लिये हुआ है न कि अंहकार के लिये।आज का काल हो या ठाकुर का कुआँ का काल,जीतती हमेशा मानवता दिखनी चाहिये परन्तु समाज में जो दिखता है वो होता नही और जो होता है वो सही सही दिखता नहीं।
जोखू के पानी मांगने पर गंगी हिम्मत करके ठाकुर के कुएं के पास डरते-डरते जाती भी है और वहाँ पहले से दो औरतों के आपस में बात-चीत को सुनती है ।इस बात चीत का विमर्श भी कहानीकार ने स्त्री विमर्श के आलोक में बखूबी उकेरा है।एक स्त्री दूसरे से कहती है कि-'हम लोगों को आराम से बैठे देखकर जैसे मर्दों को जलन होती है।'ये मर्द हमें खाली बैढ़ने भी देखना नही चाहते अभी थोड़ी देर का लाया पानी इनके लिये बासी हो गया अब जाओ पुनः ताजा पानी कुएं से ले आओ-'जैसे हम इनकी लौंडियाँ हैं।'दूसरी कहती है -लौंडियाँ नहीं तो क्या हो तुम?रोटी कपड़ा नही पाती।'ये हमें औरत समझे तब न,इनके लिये तो हम नौकर से भी कम हैं।काम करते-करते मर जाओं, पर किसी का मुँह कभी सीधा नही होता।'
एक स्त्री जो अपने पिता का घर छोड़कर ससुराल आती है वो नाज़ो में पली बढ़ी है पर जैसे ही ससुराल आती है क्या नौकरानी से भी निचले दर्जे की जिंदगी जीने के लिए विवश रहेगी ।इस कहानी में कहानीकार ने स्त्री के स्वाभिमान की भी रक्षा को प्रश्न के रूप में खड़ा किया है।गंगी तो प्रश्न है ही अन्य स्त्रियां भी समाज के कई अनुउत्तरित प्रश्न का जवाब चाहती है।निम्न वर्ग की स्त्रियों के साथ-साथ उच्च वर्ग की भी स्त्रियाँ सम्मान से जीना चाहती है पर ऐसा होता नही।
पुरूष हो जाने से क्या सब कुछ पुरूष अधीन हो जाना चाहिये ?क्या स्त्री का जीवन दोयम दर्जे का जीवन है?क्या पुरूष सिर्फ अपने अंहकार में ही जीना जानता है?क्या बिना स्त्री के पुरुष समाज चला सकता है?वस्तुतः इसका उत्तर नही ही है तब उनके साथ दोयम दर्जे का व्यवहार क्यूँ किया जाता है।यह ठाकुर का कुआँ कहानी प्रश्न खड़े करती है।जोखू और गंगी तो कहानी के पात्र हैं परन्तु यह कहना लाजमी ही है कि आज भी गाँव में जोखू और गंगी जीवित है, जीवित हैं कुएं पर बात करती दो महिलाये,जीवित हैं कही सुदूर गाँव में ठाकुर साहब भी और उनकी हैकड़ी भी।आज भी गंगी अपने पति जोखू की प्यास ठाकुर के कुएं से नही बुझा पा रही है।आज भी गांव में अलग कप और बर्तन रखे जाते हैं जोखू और गंगी के लिए।मै पूछता हूँ आखिर क्यूँ।जब नवजात शिशु की नाल कटानी होती है तब गंगी पाक साफ़ हो जाती है, खेत में काम कराना हो तो वो साफ हो जाती है, धान कुटवाना हो तो वो साफ़ हो जाती है।पेट मालिश करानी हो तो वो साफ़ हो जाती है ,बच्चे जनवाना हो तो वो साफ़ हो जाती है।घर के अंदर जब उसकी आवश्यकता हो तो घर का काम करा लो,परन्तु जैसे ही गंगी का काम आ जाये उसे अशुद्ध घोषित कर दो।कुएँ का पानी जोखू नही पी सकता पर कुआँ खोदेगा जोखू ही।वाह री व्यवस्था और वाह री मानवता।
गंगी ने अपने पति जोखू के प्यास के कारण डर के ठाकुर के कुएँ से पानी तब लेने की हिम्मत जुटाई जब उसे कोई देख न रहा हो,पर नियति को कुछ और मंजूर था।कुएँ में घड़े के जाते ही पानी भरने की आवाज से ठाकुर का दरवाजा खुला ,गंगी को लगा वो पकड़ी जायेगी उसके हाथ से पास आया पानी का घड़ा भी छूट जाता है ,भरा पानी का घड़ा पुनः कुएँ के पानी में ही गिर जाता है और गंगी डर के मारे वहाँ से भाग जाती है।
ठाकुर बार-बार पूछता है -'कौन है, कौन है?'अगर गंगी वहाँ से न भागती तो एक अलग दृश्य उभर कर आता ,परन्तु गंगी को जोखू की चिंता के साथ -साथ अपनी भी चिंता है कि कही वो पकड़ी न जाय।
यह जो डर है ये समाज में वर्ण व्यवस्था से आया है।क्या समाज में जाति बड़ी है या मानवता।बहुत पहले दैनिक जागरण के सम्पादकीय कालम में एक लेख पढ़ा था-'समाज से जाति कभी नही जाती।'का द्वंद्व भी आज इस कहानी का मूल बन गया।जाति एक मानसिक गुलामी का प्रतीक है।
मानवता ही सच्ची जाति है।मानव का मानव होना ही सद धर्म है।ऊच-नीच का व्यवहार समाज में जब तक रहेगा मानवता हारती रहेगी।गंगी के घर पहुँचने पर जोखू प्यास पर काबू नही रख पाता और वही मैला-गन्दा पानी पीने को विवस होकर पीता है।मानवीय विवस्ता की इतनी पीड़ादायक स्थिति से मन खिन्न हो जाता है।
दासता और बेड़ियां सिर्फ गरीबों के लिए हैं।समाज कब इन बंधनों से मुक्त होगा,होगा भी या नही ये तो समय बतायेगा परन्तु ठाकुर का कुआँ के माध्यम से कहानीकार ने वो सब कुछ कह दिया जो समाज का यथार्थ है।इस यथार्थ को आज भी बहुत लोग मानने के लिये तैयार नही होंगे।वो अलग से प्रश्न खड़े करेंगे।प्रश्न करना उनकी आदत है ,परन्तु वो अपने घर आयी गंगी और घर आये जोखू को आज भी अलग कप में चाय देते हुये बखान गाएंगे कि वो तो मानवता के पुजारी हैं।राजनेता भी जब वोट मांगने जाते है गंगी के घर तो एक रात उसके घर पर होटल से खाना मंगाकर खाते हुये तस्वीर खीचा लेते है और गंगी के लोग यह मानकर उसे वोट दे देते हैं कि चलो खाना भले नही खाया मेरे घर आया तो सही,क्योंकि नेता का उसके घर आना भी आज के समय में बड़ी बात है। ठाकुर का कुआँ कहानी तब भी प्रासंगिक थी,अब भी है और भविष्य में रहेगी जब तक समाज में मानवता सभी के लिये बराबर जीवित न हो जाय।
डॉ0 अखिलेश चन्द्र
आजमगढ़ ।
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