आज़मगढ़।
लेख: -विषय गम्भीर है ।अच्छी बहस और अच्छे तर्क आने चाहिये।जहाँ तक प्राकृतिक और मानव निर्मित आपदा का प्रश्न है यह प्राकृतिक रूप से ही विकराल रूप धारण करता है जब किसी क्षेत्र में बादल फटता है, कही -कही हफ़्तों वर्षा होती है तो यह प्राकृतिक आपदा से ही उत्पन्न होती है पर इसका कुशल प्रबंधन न होने से यह मानव निर्मित रूप में बदल जाती है।जिस क्षेत्र की सरकार इसका कुशल प्रबंधन करती है तो प्राकृतिक आपदा वाले इलाके में भी यह नियंत्रित की जा सकती है और बहुत सी जान बचायी जा सकती है।बाढ़ एक प्राकृतिक आपदा होते हुये भी मानव निर्मित आपदा में बदल जाती है।वैसे भी कोई भी समस्या का सही निदान न कर पाना वह मानव निर्मित श्रेणी में ही आता है क्योंकि आपदा तो प्राकृतिक असन्तुलन से जन्म लेती रहती है और इतिहास से कुछ सबक लेकर उन आने वाले समस्याओं का निराकरण करते रहना चाहिए।हल्की वर्षा में अच्छे शहर जलमग्न हो जाते है यह कुप्रबंधन का परिणाम है।भारत मे किसी समस्या को राजनीतिक लोग समाप्त करना नही चाहते वरना वो राजनीति किस बात पर करेंगे।हम 74 साल से गरीबी,बेरोजगारी, अशिक्षा को दूर करने के लिये सरकार बनाते है और लोगों की गरीबी,बेरोजगारी और अशिक्षा दूर हो न हो ये नेता जरूर गरीब की गरीबी दूर करते करते अमीर दर अमीर,स्वयं की बेरोजगारी और अपनी अशिक्षा से शिक्षित व्यक्ति की अवहेलना करते सत्ता का सुख लेते हैं।इस देश की समस्त समस्या मानव निर्मित अधिक है।जिस देश मे 05 किलो अनाज को ही विकास माना जाय और उस पर भी यह श्रेय लेने की होड़ हो कि यह केंद्र /राज्य सरकार में से किसने दिया है वहाँ तर्क युक्त बात यही है कि सरकार आती है जाती है पर आम आदमी वहीं का वही खड़ा रहता है।
याद कीजिए क्या प्रेमचंद साहित्य का होरी,घीसू,माधव के जीवन मे आज भी कोई बदलाव आया।दो बीघा जमीन के बलराज साहनी के निभाये गए चरित्र हाथ से हाथ गाड़ी खिंचता इंसान की जिंदगी में कोई बदलाव आया।क्या मदर इंडिया की नायिका नरगिस जो बैल की जगह खुद जुआट में जुड़कर हल चलाती है वैसे किसान आज गांव में नही है।सब कुछ 74 वर्ष पूर्ण जैसे ही है।यह मात्र अपने सुख के कारण जनता को छलते है।सरकार किसी की भी हो सब मिलजुलकर बाँट कर खाते हैं और जनता को दिवास्वप्न जैसे हवा में किला बनता दिखलाते है जब कि आप सभी वाकिफ है हवा में किला कभी भी नही बनता।हम अपने दम पर अपनी मेहनत से जो कुछ भी हासिल कर लेते हैं उसी को सरकारें अपनी उपलब्धियों में अपने खाते में गिनाती है।किसी सफल व्यक्ति के पीछे सब खड़े हो जाते है।चाहे वह सरकार हो,बिरादरी हो अथवा समाज।एक गरीब व्यक्ति का कोई नही होता,न सरकार न उसकी बिरादरी।बात थोड़ी कड़वी जरूर है पर वास्तविक हकीकत यही है।आज बृद्धाश्रम को ही ले लें वहाँ किसकी मां,बहन,पिता रह रहे हैं।90%सोफिसिटिकेटेड लोगो के रिश्तेदार।कोई भी गरीब इतना स्वाभिमानी होता है कि वह भूखा रह लेगा पर इस तरह का आचरण नही करेगा।जो जितना भरा है दरअसल स्वाभाविक आचरण पर वह उतना ही खाली है।रोज कुआं खोदना रोज पानी पीने वाले का दरअसल कोई नही होता।यह सब समस्या भी मानव निर्मित है।एक गरीब को हवाई जहाज में उड़ने का स्वप्न दिखा कर सत्ता में आती सरकारें उन्हें स्वप्न दिखाकर अपना काम निकालती है।किसी और का किया काम का फीता काटती है।करोड़ो डकारती है और तो और पचा भी लेती है।आम आदमी सिर्फ और सिर्फ दिवास्वप्न के सब्जबाग में घूमता है ।एक उम्मीद के लिये कि कभी कोई अच्छी सरकार आएगी और उसकी प्राकृतिक आपदा को मानव निर्मित नही होने देगी और इसी में पीढियां बदलती है और समस्या पुनः मुँह बाए नई पीढ़ी में भी अपने को जीवित रखती है।
हम भारत के लोग इसके आदी हो चुके हैं ।यहाँ कोई किसी के लिये उत्तरदायी नही है।दरअसल यहाँ मतलबी अधिक है हां ये ढोंग करेंगे कि वो आपके सबसे बड़े हितैसी है पर वास्तविकता वो है जो में बता रहा हूँ।यहाँ रिश्ते भी स्वार्थ के लिये बनाये जाते हैं। हमाम में सब नगें हैं बस कपड़े पहने दिखाई देते है, कुछ एक को छोड़कर।आप सभी को यकीन न हो तो अपने सबसे खास से कभी कुछ सहायता या सहायता राशि मांगकर देखों आप होश में आ जाओगे।आपका वहम भी दूर हो जाएगा।जिस किसी की सरकार बनाने में आपने डंडे खाये हैं उसी से कुछ काम करवाने के लिये कहें,आपको तब पता चलेगा कि वहाँ आपको कितने नामों से लोग जानते हैं।कार्यकर्ता की हैसियत से जब तक चुपचाप काम करेंगे इज्जत बनी रहेगी।जिस दिन काम कह देंगे सबसे पहले आपकी जाति सामने आएगी की इनका काम किसी से कहना भी है या नही।दरअसल समाज इतने भागों में बांट दिया गया है कि आप अपनी मेहनत पर ही सिर्फ भरोसा कर सकते हैं ।प्राकृतिक आपदा तो आती रहती है और वो आएगी भी,पर मानव निर्मित आपदाएं कभी भी खत्म नहीं होंगी क्योंकि इन्हें बनाये रखा जाता है।आप बड़े हो जाते हैं और समस्या उससे बड़ी।समस्या खत्म नही होती यहाँ इंसान खत्म होकर नई पीढ़ी में बदल जाता है और नई पीढ़ी फिर उन्ही समस्याओं से जूझती है जिस समस्या से बाप-दादा जूझकर चले गए।दरअसल प्राकृतिक समस्या और मानव समस्या साथ साथ चलती है।नेता इसे बनाये रहते हैं जनता इसे भुगती हैं और यह निरन्तर चलती रहती है।समाज गतिशील है यह भी अपनी गति से चलती है।रिक्शा चलाने वाले एक व्यक्ति के पैर में बिवाई से खून निकलता देखकर पीछे बैठा व्यक्ति पूँछता है भाई दर्द हो रहा होगा कैसे रिक्शा चला रहे हों, रिक्शे वाले ने कहा-'साहब रिक्शा पैर से नही पेट से चला रहा हूँ।'इस वेदना पर भी पीछे बैठा साहूकार न तो रिक्शे से उतरता है उसकी जेब पैसे से भरी रहने के बावजूद उसे कुछ पैसे इलाज को भी नही देता।भावना दिखाना अलग बात है उस पर चलना अलग बात है।फ़िल्म मजदूर का महेन्द्र कपूर का गाना -'हम मेहनतकश इस दुनियां से जब अपना हिस्सा माँगेगे,एक खेत नही,एक बांग नही,हम सारी दुनियां मांगेंगे।'यह सुनने में अच्छा है जरा मांग के कोई देखे,समाज आईना दिखाने के लिये तैयार है।कहने का आशय सिर्फ इतना है अपनी मेहनत से जो कुछ भी हासिल किया जा सकता है जो कुछ भी सुधारा जा सकता है उसी पर भरोसा करना सीखना होगा।यही जिंदगी है इसे अच्छे से समझना होगा।
